KORBA :छेरछेरा कोठी के धान ल हेरतेच हेरा … हर्षोल्लास से मनाया गया लोकपर्व , लोकनाद करती हुई निकली बच्चों की टोली ….

कोरबा । जिले में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और आस्था का सबसे बड़ा लोकपर्व छेरछेरा धूमधाम से मनाया जा रहा है। यह पर्व समृद्ध लोक-संस्कृति का प्रतीक है, जिसे लोग पीढ़ियों से निभाते आ रहे हैं।

पर्व के आगमन के साथ ही गांवों में रौनक लौट आई है। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी टोली बनाकर “छेरछेरा कोठी के, धान ल हेर हेरा” का पारंपरिक नारा लगाते हुए घर-घर घूम रहे हैं। इस लोकनाद से पूरा क्षेत्र छेरछेरा की लोकधुन और उल्लास से गूंज उठा है।

👉एकता, भाईचारा का पर्व

इस अवसर पर किसान अपनी मेहनत से उपजाई गई फसल का एक हिस्सा श्रद्धापूर्वक दान करते हैं। यह अन्नदान केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि समाज में समानता, सहयोग और मानवीय संवेदना का प्रतीक माना जाता है।

छेरछेरा पर्व यह संदेश देता है कि प्रकृति और परिश्रम से मिली समृद्धि को समाज के साथ साझा करना ही सच्चा धर्म है। कोरबा जिले में यह पर्व आज भी पूरी परंपरा और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया जा रहा है।
गांवों में लोकगीत, पारंपरिक वेशभूषा और सामूहिक सहभागिता इस पर्व को और भी खास बनाती है। छेरछेरा न केवल अन्नदान का पर्व है, बल्कि यह समाज में एकता, भाईचारा और आपसी सहयोग की भावना को मजबूत करने वाला उत्सव भी है।

👉इसलिए मनाया जाता है छेरछेरा

महादान और फसल उत्सव के रूप त्यौहार मनाया जाने वाला छेरछेरा तिहार छत्तीसगढ़ के सामाजिक समरसता, समृद्ध दानशीलता की गौरवशाली परम्परा का संवाहक है. इस दिन ‘छेरछेरा, कोठी के धान ल हेरहेरा’ बोलते हुए गांव के बच्चे, युवा और महिलाएं खलिहानों और घरों में जाकर धान और भेंट स्वरूप प्राप्त पैसे इकट्ठा करते हैं और इकट्ठा किए गए धान और राशि से वर्षभर के लिए कार्यक्रम बनाते हैं. छत्तीसगढ़ के किसानों में उदारता के कई आयाम दिखाई देते हैं. यहां उत्पादित फसल को समाज के जरूरतमंद लोगों, कामगारों और पशु-पक्षियों के लिए देने की परम्परा रही है.

👉छेरछेरा पर्व का महत्व

छेरछेरा का दूसरा पहलू आध्यात्मिक भी है, यह बड़े-छोटे के भेदभाव और अहंकार की भावना को समाप्त करता है. फसल के घर आने की खुशी में पौष मास की पूर्णिमा को छेरछेरा पुन्नी तिहार मनाया जाता है. इसी दिन मां शाकम्भरी जयंती भी मनाई जाती है. पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान शंकर ने माता अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगी थी, इसलिए लोग धान के साथ साग-भाजी, फल का दान भी करते हैं. पौष पूर्णिमा धान के लिए प्रसिद्ध है. संपूर्ण भारतवर्ष में इस शुभदिन अन्न, दलहन-तिलहन का दान करना बेहद शुभ माना जाता है. यह सूर्य के उत्तरायण की प्रथम पूर्णिमा है. अत: इसका विशेष महत्व माना गया है.

👉शाकंभरी माता की जयंती

शाकम्भरी माता देवी भगवती का अवतार है. ऐसा माना जाता है कि देवी भगवती ने पृथ्वी पर अकाल और गंभीर खाद्य संकट को कम करने के लिए शाकम्भरी मां का अवतार लिया था. इन्हें सब्जियों, फलों और हरी पत्तियों की देवी के रूप में भी जाना जाता है. शाकम्भरी नवरात्रि की पूर्णिमा का महत्व अत्याधिक है. इस दिन को पौष पूर्णिमा के नाम से देश के विभिन्न स्थानों पर मनाया जाता है. इस दिन लोग पवित्र नदी पर जाकर स्नान करते हैं. ऐसा करने से मां लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है. साथ ही व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है.