CG : CM हेल्पलाइन पर शिकायतों के निराकरण में अफसरों की मनमानी पर साय सरकार सख्त ! PWD के 13 अधिकारियों को नोटिस, निगरानी तंत्र पर उठे सवाल…

रायपुर । आम जनता की समस्याओं का त्वरित समाधान करने के उद्देश्य से शुरू की गई सीएम हेल्पलाइन पर शिकायतों के निराकरण को लेकर अधिकारियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शिकायतों का सही तरीके से समाधान करने के बजाय उन्हें बिना ठोस जानकारी और सारगर्भित टीप के बंद किए जाने के मामले में अब लोक निर्माण विभाग ने 13 अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। विभाग ने अधिकारियों से 15 दिनों के भीतर जवाब मांगा है। यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है, जब मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय खुद सीएम हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायतों के निराकरण की समीक्षा कर चुके हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर आम नागरिकों की शिकायतों की निगरानी करने वाला तंत्र अब तक क्या कर रहा था ?

गौरतलब है कि सूबे की साय सरकार ने 9 जून को सीएम हेल्पलाइन 1076 की शुरूवात की थी। सीएम हेल्पलाइन नंबर की शुरुआत आम जनता के लिए इस उद्देश्य से की गई थी कि नागरिक अपनी समस्याएं दर्ज करा सकें और उनका समयबद्ध समाधान हो। इस व्यवस्था से उम्मीद थी कि लोगों को अपनी शिकायतों के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे और संबंधित अधिकारी जवाबदेही के साथ कार्रवाई करेंगे। लेकिन मुख्यमंत्री की समीक्षा के बाद सामने आए मामलों ने इस व्यवस्था के क्रियान्वयन और निगरानी तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक दिन पहले तहसीलदार के निलंबन के बाद अब लोक निर्माण विभाग में शिकायतों के निराकरण को लेकर गंभीर मामले सामने आये है।

विभाग के अनुसार, अगस्त और सितंबर 2026 में दर्ज शिकायतों की समीक्षा के दौरान पाया गया कि एल-1, एल-2 और एल-3 स्तर पर कुछ शिकायतें ऐसी टिप्पणियों के साथ बंद की गईं, जिनसे यह स्पष्ट नहीं होता था कि शिकायतकर्ता की समस्या का वास्तव में समाधान हुआ भी है या नहीं। यानी पोर्टल पर शिकायत बंद होने का रिकॉर्ड तो दर्ज हो गया, लेकिन उसके समाधान की स्थिति पर सवाल बने रहे। यदि शिकायतों को बिना पर्याप्त कार्रवाई के बंद किया जा रहा था, तो इसकी निगरानी करने वाले अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आती है।

👉मुख्यमंत्री की समीक्षा के बाद हरकत में आया तंत्र

सीएम हेल्पलाइन शुरू होने के करीब चार महीने बाद मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने शुक्रवार 16 अक्टूबर को हेल्पलाइन पर आने वाली शिकायतों की समीक्षा की। इसके बाद शिकायतों के निराकरण में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई का सिलसिला सामने आ रहा है। यह घटनाक्रम प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठाता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यहीं कि….यदि शिकायतों का निराकरण केवल औपचारिक टिप्पणी के आधार पर किया जा रहा था, तो इसकी जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों तक पहले क्यों नहीं पहुंची ?

क्या नियमित समीक्षा और जवाबदेही तय करने की व्यवस्था प्रभावी ढंग से काम कर रही थी ? ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब मिलना जरूरी है। एक दिन पहले ही मुख्यमंत्री के निर्देश पर कबीरधाम जिले में सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों के निराकरण में लापरवाही के मामले में एक तहसीलदार को निलंबित किया गया था। अब लोक निर्माण विभाग के 13 अधिकारियों को नोटिस जारी किए जाने से स्पष्ट है कि शिकायतों के निराकरण में जवाबदेही तय करने पर जोर दिया जा रहा है।

👉3 स्तरों पर शिकायतें बंद करने में मिली गड़बड़ी

लोक निर्माण विभाग की समीक्षा में शिकायतों के निराकरण के तीन स्तरों पर कमियां सामने आईं। एल-1 स्तर: पांच अनुविभागीय अधिकारियों को नोटिस जारी किया गया। एल-2 स्तर: पांच कार्यपालन अभियंताओं से जवाब मांगा गया। एल-3 स्तर: तीन अधीक्षण अभियंताओं को कारण बताओ नोटिस दिया गया। इन अधिकारियों पर शिकायतों को उचित निराकरण के बिना या पर्याप्त जानकारी दर्ज किए बगैर बंद करने से संबंधित लापरवाही के आरोप हैं। विभाग ने स्पष्ट किया है कि शिकायत बंद करते समय संबंधित अधिकारी की टिप्पणी में स्थल निरीक्षण के निष्कर्ष, की गई या प्रस्तावित कार्रवाई, कार्रवाई की तारीख अथवा समय-सीमा और शिकायतकर्ता को दी गई सूचना का उल्लेख होना चाहिए।

यदि शिकायत किसी दूसरे विभाग से संबंधित है, तो उसका कारण भी स्पष्ट करना होगा। विभाग के मुताबिक, इन विवरणों के अभाव में शिकायतकर्ता की समस्या के समाधान की पुष्टि नहीं हो पाती और पोर्टल पर दर्ज निराकरण के आंकड़े भ्रामक हो सकते हैं। इसे कर्तव्य पालन में लापरवाही मानते हुए संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया है। सभी 13 अधिकारियों को नोटिस मिलने के 15 दिनों के भीतर लोक निर्माण विभाग के सचिव के समक्ष लिखित प्रतिवाद प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। तय समय में जवाब नहीं मिलने पर एकतरफा कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।

👉असली सवाल: शिकायत बंद हुई या समस्या का समाधान भी हुआ ?

सीएम हेल्पलाइन जैसी व्यवस्था की सफलता इस बात से तय नहीं होती कि कितनी शिकायतें पोर्टल पर बंद कर दी गईं। असली कसौटी यह है कि कितने नागरिकों की समस्याओं का वास्तविक समाधान हुआ और शिकायतकर्ता उस कार्रवाई से संतुष्ट है या नहीं। पीडब्ल्यूडी के 13 अधिकारियों को नोटिस और कबीरधाम के तहसीलदार के निलंबन का मामला प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की दिशा में उठाए गए कदम हैं। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि ऐसी स्थिति बनने से पहले निगरानी तंत्र ने क्या कार्रवाई की।

आम जनता आज भी सीएम हेल्पलाइन पर इस भरोसे के साथ अपनी शिकायत दर्ज कराती है कि उसका समय पर समाधान होगा। लेकिन कई जिलों में जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता और मनमानी सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के उद्देश्य पर सवाल खड़े कर रही है। अब देखना होगा कि कार्रवाई केवल नोटिस जारी करने तक सीमित रहती है या शिकायतों के वास्तविक निराकरण के लिए ऐसी प्रभावी व्यवस्था भी बनाई जाती है, जिसमें अधिकारियों की जवाबदेही तय हो और आम नागरिकों को समय पर राहत मिल सके।