रायपुर। वर्ष 2000 में जब मध्य प्रदेश के विशाल भूगोल को काटकर छत्तीसगढ़ का नक्शा उकेरा गया, तब दिल्ली से लेकर भोपाल तक के राजनीतिक पंडितों ने यही भविष्यवाणी की थी कि केवल 90 सीटों वाली इस छोटी विधानसभा में हर विधायक खुद को मुख्यमंत्री का दावेदार समझेगा और राज्य हर छह महीने में एक नए राजनीतिक संकट की तरफ बढ़ेगा। लेकिन छत्तीसगढ़ ने अपने पहले ही दशक में इस पूरी पटकथा को उलट दिया और शांत, परिपक्व तथा जन-जनादेश को सिर आंखों पर रखने वाले राज्य के रूप में खुद को स्थापित किया।

छत्तीसगढ़ की इस राजनीतिक कहानी का शुरुआती अध्याय हालांकि काफी नाटकीय और गर्माहट भरा रहा। राज्य बनने के बाद जब कांग्रेस के कद्दावर और नौकरशाह से नेता बने अजीत जोगी ने पहले मुख्यमंत्री के तौर पर कमान संभाली, तब से ही राजनीतिक उठापटक का दौर शुरू हो गया। जोगी का कार्यकाल अपनी अप्रत्याशित रणनीतियों, विपक्ष में सेंधमारी और सत्ता के विकेंद्रीकरण के साथ-साथ एकछत्र प्रभाव कायम करने की कोशिशों के लिए जाना गया। उनके कार्यकाल में 12 विधायक दलबदल कर भाजपा से कांग्रेस में चले गए थे। फिर 2003 के पहले विधानसभा चुनाव की चौखट पर पहुंचते-पहुंचते माहौल इतना कस गया कि चुनाव के ठीक बाद जब जनादेश भाजपा के पक्ष में आया, तब छत्तीसगढ़ ने विधायकों की खरीद-फरोख्त की वह सबसे बड़ी राजनीतिक साजिश देखी, जिसने जोगी के पूरे राजनीतिक करियर पर एक अमिट विवाद का ठप्पा लगा दिया। ऑडियो टेप और स्टिंग प्रकरण के उस बवंडर के बाद लगा कि शायद विश्लेषकों की वही आशंका सच होने जा रही है और नया राज्य एक गहरे राजनीतिक दलदल में फंसने जा रहा है।
👉2003 से बदल गया राजनीतिक गणित
… लेकिन 2003 का वह राजनीतिक मोड़ वास्तव में छत्तीसगढ़ की राजनीति का ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुआ। जनता ने यह साफ संदेश दे दिया था कि उसे सत्ता का नाटक नहीं, बल्कि स्थिरता चाहिए। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी के डॉ. रमन सिंह ने सत्ता संभाली और अगले 15 वर्षों तक राज्य की राजनीति को एक ऐसी शांति और स्थिरता दी जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। डॉ. रमन सिंह के इन तीन कार्यकालों की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि मध्य अवधि में मुख्यमंत्री बदलने का जो सिलसिला पड़ोसी राज्यों झारखंड और उत्तराखंड में एक आम बीमारी की तरह फैल चुका था, उसकी एक छोटी सी आहट भी छत्तीसगढ़ में नहीं सुनाई दी। राज्य के मतदाताओं ने 2003, 2008 और 2013 के चुनावों में भाजपा को लगातार स्पष्ट जनादेश दिया, जिससे किसी भी तीस दल या निर्दलीय विधायकों के पास ब्लैकमेलिंग की चाबी नहीं रही।
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