बिलासपुर। शादी का वादा कर शारीरिक संबंध बनाने और बाद में विवाह से इनकार करने से जुड़े एक मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि शादी का हर अधूरा वादा दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता। इसके लिए यह साबित होना जरूरी है कि आरोपी ने शुरुआत से ही शादी करने का कोई इरादा नहीं रखा था और केवल शारीरिक संबंध बनाने के उद्देश्य से झूठा आश्वासन दिया था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 67 वर्षीय हिमांशु झा को बरी किए जाने के खिलाफ महिला की अपील खारिज कर दी है।
👉निचली अदालत का फैसला और डिवीजन बेंच
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद जगदलपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। निचली अदालत ने आरोपी को आरोपों से दोषमुक्त कर दिया था।
👉मामले की शुरुआत
मामले की शुरुआत 2021 में हुई थी। शिकायतकर्ता महिला और आरोपी की मुलाकात एक संगीत समूह में हुई थी। महिला पहले से विवाहित थी, हालांकि वह अपने पति से अलग रह रही थी और कानूनी रूप से तलाक नहीं हुआ था। महिला के अनुसार, आरोपी ने बताया था कि उसकी पत्नी का निधन हो चुका है और उसने विवाह का प्रस्ताव रखा।
👉आरोप और शिकायत
महिला का आरोप था कि आरोपी ने शादी का आश्वासन देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। उसका कहना था कि बाद में पता चला कि आरोपी की पत्नी जीवित है, और जब उसने शादी की बात कही तो आरोपी ने कथित तौर पर मारपीट की और धमकी दी। महिला ने दिसंबर 2023 में पुलिस से संपर्क किया था, लेकिन उसके अनुसार शादी के आश्वासन के कारण उस समय एफआईआर नहीं कराई गई। आखिरकार मई 2024 में मामले में एफआईआर दर्ज हुई।
👉हाईकोर्ट में अपील और अदालत की टिप्पणी

निचली अदालत से बरी होने के बाद महिला ने हाईकोर्ट में अपील की। उसका तर्क था कि निचली अदालत ने उसके बयान और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114-ए पर पर्याप्त विचार नहीं किया।
हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों के बीच लंबे समय तक संबंध रहे, और उपलब्ध परिस्थितियां सहमति से शारीरिक संबंध की ओर संकेत करती हैं। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि महिला को आरोपी के पारिवारिक जीवन की जानकारी थी। पहली बार जबरदस्ती होने की बात उपलब्ध साक्ष्यों से स्थापित नहीं हुई।
चिकित्सकीय परीक्षण में जबरन संबंध से जुड़ी चोटों के निशान नहीं मिले। अदालत ने कहा कि केवल चोटों का न होना अपने आप में सहमति का प्रमाण नहीं है, इसलिए इसे अन्य साक्ष्यों के साथ देखा गया।
👉शादी का झूठा वादा और वादा पूरा न होने में अंतर
हाईकोर्ट ने शादी के झूठे वादे और परिस्थितियों के कारण शादी का वादा पूरा न होने के बीच कानूनी अंतर स्पष्ट किया। अदालत के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति शुरुआत से ही विवाह की मंशा नहीं रखता और केवल शारीरिक संबंध के लिए झूठा वादा करता है, तो यह दुष्कर्म का मामला बन सकता है।
लेकिन यदि दो वयस्कों के बीच सहमति से संबंध बने हों और बाद में किसी कारणवश विवाह नहीं हो पाए, तो केवल वादा पूरा न होने के आधार पर दुष्कर्म साबित नहीं माना जा सकता।
👉सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का आधार
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का हवाला दिया, जिनमें विवाह के झूठे आश्वासन पर सहमति और वास्तविक विवाह प्रस्ताव के बाद रिश्ता टूटने के बीच अंतर पर विचार किया गया है। अदालत ने कहा कि इस मामले में यह साबित नहीं हुआ कि आरोपी ने शुरुआत से ही धोखे की नीयत से संबंध बनाए थे।
👉अपील खारिज, बरी का फैसला बरकरार
सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार के बाद हाईकोर्ट ने महिला की अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही हिमांशु झा को बरी किए जाने का फैसला बरकरार रहा। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि शादी का वादा पूरा न होना और शुरुआत से धोखे की नीयत से झूठा आश्वासन देना कानूनी रूप से अलग स्थितियां हैं। ऐसे मामलों में सहमति, आरोपी की शुरुआती मंशा और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण जरूरी होता है।
👉यह खबर क्यों जरूरी है
शादी के वादे पर बने संबंधों और दुष्कर्म के आरोपों की कानूनी सीमा पर यह फैसला अहम है। अदालत ने साफ किया कि हर अधूरा वादा अपराध नहीं बनता। इसके लिए शुरुआत की मंशा और सहमति का परीक्षण जरूरी है। ऐसे मामलों में पीड़िता और आरोपी दोनों के अधिकारों का संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है।
FAQ
👉सवाल 1: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शादी के वादे पर क्या कहा?
जवाब: हाईकोर्ट ने कहा कि शादी का हर अधूरा वादा दुष्कर्म नहीं होता। इसके लिए यह साबित होना जरूरी है कि आरोपी ने शुरुआत से शादी का इरादा नहीं रखा था।
👉सवाल 2: क्या इस मामले में आरोपी बरी रहा?
जवाब: हां, निचली अदालत के बरी करने के फैसले को हाईकोर्ट ने बरकरार रखा और महिला की अपील खारिज कर दी।
👉सवाल 3: शादी का झूठा वादा और वादा टूटने में क्या अंतर है?
जवाब: अदालत के अनुसार, शुरुआत से ही धोखे की नीयत से दिया गया झूठा वादा अलग है। सहमति से संबंध बनने के बाद किसी कारण से शादी न होना अलग है।
