KORBA :जीवन में स्थिरता के लिए इच्छाओं को वश में कर ध्रुव जैसी अटूट आस्था और दृढ़ संकल्प अपनाने की जरूरत – कामता प्रसाद शरण जी महाराज,दीपका मातृछाया दीपेश्वरी मंदिर प्रांगण में जायसवाल परिवार द्वारा आयोजितश्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह में बह रही भक्ति की बयार

0 शरीर नश्वर , केवल आत्मा ही सत्य है, इसलिए जात-पात और ऊंच-नीच का भेद भूलकर हर जीव में नारायण के दर्शन करने चाहिए …

कोरबा -दीपका । कोयलांचल नगरी दीपका के मातृछाया दीपेश्वरी मंदिर प्रांगण में इन दिनों भक्ति की बयार बह रही है। जायसवाल परिवार द्वारा आयोजित इस भव्य संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के विशेष प्रसंग में सुप्रसिद्ध कथाव्यास पूज्यपाद कामता प्रसाद शरण जी महाराज ने ध्रुव चरित्र और जड़ भरत की दिव्य कथाओं का ऐसा जीवंत वर्णन किया कि पूरा पंडाल ‘जय श्री कृष्णा’ और ‘हरि ओम’ के जयकारों से गुंजायम हो उठा। महाराज श्री के मुखारविंद से कथाअमृत का श्रवण करने दीपका सहित आसपास के क्षेत्रों से आस्था का सैलाब उमड़ रहा ।

📌 ध्रुव चरित्र: ५ वर्ष के बालक की दृढ़ता से सीखें संकल्प शक्ति

कथा व्यास पीठ से प.कामता प्रसाद शरण जी महाराज ने ध्रुव चरित्र की व्याख्या करते हुए कहा कि भक्ति की कोई उम्र नहीं होती। महाराज श्री ने कहा:
“जब ५ वर्ष का एक छोटा बालक सौतेली माँ के कटु वचनों से आहत होकर, अपनी माता सुनीति के कहने पर सर्वस्व त्याग कर मधुवन की ओर निकल सकता है, तो हम सांसारिक दुखों से घबराकर भगवान को क्यों नहीं पुकारते? ध्रुव का संकल्प अचल था। आज के मानव को अपनी इच्छाओं को वश में कर ध्रुव जैसी अटूट आस्था और दृढ़ संकल्प अपनाने की जरूरत है, तभी जीवन में स्थिरता (ध्रुव पद) आएगी।”

📌 जड़ भरत कथा: एक हिरण के मोह ने राजा को बना दिया पशु, मोह ही बंधन है

इसके बाद महाराज श्री ने जड़ भरत की मर्मस्पर्शी कथा सुनाकर पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को भावुक कर दिया। उन्होंने समझाया कि भक्ति मार्ग में ‘मोह’ सबसे बड़ा रोड़ा है। महाराज श्री ने उद्घोष करते हुए कहा:

“चक्रवर्ती सम्राट राजा भरत, जिन्होंने भगवान के लिए राजपाठ छोड़ दिया, वे केवल एक हिरण के बच्चे के मोह में फंसकर अगले जन्म में हिरण बन गए। यह कथा हमें चेतावनी देती है कि संसार में रहते हुए कर्तव्य निभाएं, लेकिन किसी से ऐसा अंधा मोह न करें जो आपको ईश्वर से दूर कर दे। मन को हमेशा ‘जड़’ यानी संसार के प्रति उदासीन और परमात्मा के प्रति जागृत रखना ही सच्ची बुद्धिमानी है।”

महाराज श्री ने राजा रहूगण और जड़ भरत के संवाद का उदाहरण देते हुए कहा कि शरीर नश्वर है, केवल आत्मा ही सत्य है। इसलिए जात-पात और ऊंच-नीच का भेद भूलकर हर जीव में नारायण के दर्शन करने चाहिए।