हुक्म या आदेश न मानना अनुशासनहीनता , नौकरी से निकालने की पर्याप्त वजह नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड से जुड़े मामलों में सुनाया अहम फैसला ….

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी में कहा कि किसी पुराने कर्मचारी को अनुशासनहीनता, हुक्म या आदेश न मानने के लिए नौकरी से नहीं निकाला जा सकता। ऐसी सजा सिर्फ भ्रष्टाचार, अनैतिक आचरण या एम्प्लॉयर को नुकसान पहुंचाने वाली बुरी नीयत वाली हरकतों के केस में ही दी जानी चाहिए।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने एक मामले की सुनवाई के दौरान ये बात कही है।

👉बेंच ने पूरे मामले में क्या कहा

बेंच ने कहा कि हम काम की जगह पर अनुशासन के महत्व को कम नहीं आंक रहे हैं। लेकिन भ्रष्टाचार, गैर-कानूनी तरीके से पैसे लेना, अनैतिक आचरण, फंड का गलत इस्तेमाल, एम्प्लॉयर को साबित नुकसान, सार्वजनिक बदनामी या संगठन की बदनामी करने वाले व्यवहार के बिना, किसी कर्मचारी को नौकरी से निकालने जैसी कड़ी सजा नहीं दी जा सकती

👉महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड से जुड़ा है मामला

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि सजा का गलत काम की गंभीरता, पिछले सर्विस रिकॉर्ड, आस-पास के हालात और संस्थान पर गलत काम के असर से उचित संबंध होना चाहिए। महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड के एक कर्मचारी को नौकरी से निकालने के 2017 के आदेश को रद्द करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि नौकरी से निकालने पर कर्मचारी और मालिक का रिश्ता हमेशा के लिए खत्म हो जाता है और कर्मचारी रिटायरमेंट के फायदों से वंचित हो जाता है।

👉शीर्ष कोर्ट ने कहा- ऐसे फैसलों से कर्मचारी ही नहीं परिवार पर भी असर

शीर्ष कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे फैसलों से न सिर्फ कर्मचारी की मौजूदा कमाई का जरिया खत्म होता है, बल्कि उस पर निर्भर परिवार के सदस्यों को भी प्रभावित होना पड़ता है। जस्टिस एनके सिंह ने कहा कि नौकरी से निकाले जाने पर व्यक्ति के सर्विस रिकॉर्ड पर हमेशा के लिए दाग लग जाता है और इससे भविष्य में नौकरी मिलने की संभावनाओं पर बुरा असर पड़ सकता है। खासकर सरकारी नौकरी, वैधानिक निकायों, पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग और दूसरे रेगुलेटेड संस्थानों में, जहां पिछले रिकॉर्ड और सर्विस रिकॉर्ड मायने रखते हैं।

👉सिर्फ भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मामले में ही कर्मचारी को नौकरी से निकाला जा सकता है’

जस्टिस एनके सिंह ने कहा कि ऐसे में नौकरी से निकालने की सजा सिर्फ उन मामलों के लिए होनी चाहिए जहां गलत काम बहुत गंभीर हो और जहां सहानुभूति दिखाना ठीक न हो। कर्मचारी की 21 साल की सेवा को ध्यान में रखते हुए – जो अब रिटायरमेंट की उम्र पार कर चुकी हैं, बेंच ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे कथित अनुशासनहीनता, हुक्म न मानने, आदेश न मानने और सरकारी दस्तावेजों को नष्ट करने के लिए उन पर लगाई जाने वाली सजा की प्रकृति पर फिर से विचार करें।