0 चंदे श्रमदान से ग्रामीण बना रहे बच्चों के लिए पक्की छत ,CM हुए सख्त, बोले – ‘हादसे का इंतजार मत करो’ ….
गरियाबंद । छत्तीसगढ़ में छात्रों की सुरक्षा और जर्जर भवनों को लेकर सरकार ने भले ही सख्त रुख अपनाया हो, लेकिन जमीनी हकीकत सरकारी दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने हाल ही में सभी कलेक्टर और एसपी को जर्जर स्कूल भवन, छात्रावास, पीजी, कोचिंग सेंटर और अन्य जोखिमपूर्ण इमारतों की तत्काल जांच कर हादसे से पहले कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
गुख्यमंत्री ने साफ कहा है कि लापरवाही हुई तो जवाबदेही तय होगी। लेकिन इसी बीच गरियाबंद जिले से सामने आई तस्वीर सिस्टम की उस बेरुखी को उजागर करती है. जहां बच्चों के भविष्य की नींव रखने वाला स्कूल भवन पिछले चार साल से जर्जट पड़ा है वहीं बच्च्चे गाय के कोठे में पढ़ने को मजबूर हैं। दूसरी ओर व्यवस्था की बेरुखी से परेशान ग्रागीण ओर पालक चंदा जुटाकर खुद ही स्कूल भवन की गरम्गत के लिए श्रगदान करने को मजबूर हैं।
जर्जर शिक्षा व्यवस्था और सरकारी सिस्टम की बेरुखी का ये पूरा मामला गरियाबंद जिले के मैनपुर ब्लॉक में सचालित शासकीय प्राथमिक शाला मोतीपानी का है। स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक जर्जर स्कूल भवन का निर्माण कार्य पिछले करीब चाट वर्षों से अधूरा है। पुटाने ओर जर्जर भवन में बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रही, लेकिन जिम्मेदार विभागों की ओर से समय रहते स्थायी समाधान नहीं किया गया। हालात इतने खराब बताए जा रहे हैं कि बच्चों की पढ़ाई के लिए शिक्षकों को गाय के कोठे में स्कूल चलाने की मजबूटी तक आ गई। जिस जगह बच्चों को बेहतर शिक्षा, सुरक्षित वातावरण और सुविधाएं मिलनी चाहिए थीं, वहां व्यवस्था की मजबूरी उनकी पढ़ाई का हिस्सा बन गही
👉जब सिस्टम नहीं जागा तो ग्रामीणों ने उठाई जिम्मेदारी
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस स्कूल भवन का मरम्मत और जीर्णोधार सरकार की व्यवस्था और निगरानी में पूटा होना था, उसके लिए अब ग्रामीण और पालक चंदा जुटा रहे हैं और श्रमदान कर जर्जर स्कूल भवन को दोबारा मरम्मत कर सुरक्षित परिवेश तैयार करने का प्रयास कर रहे है। यानी सरकारी व्यवस्था से जिस काम की उम्मीद थी, वह काम अब गांव के लोग अपने स्तर पर करने को मजबूर हैं। यह तस्वीर सिर्फ एक जर्जर स्कूल भवन की नहीं है, बल्कि सालों से इस जर्जर स्कूल भवन और बच्चों की लाचारी भरी शिक्षा व्यवस्था पर किसी भी जवाबदार अधिकारी की नजर क्यों नही पड़ी ? दिल्ली हादसे के मुख्यमंत्री साय ने 10 सितंबर को ही अधिकारियों के साथ बैठक में विद्यार्थियों और नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए जोखिमपूर्ण भवनों की तत्काल जांच के निर्देश है।
उन्होंने पुराने और जर्जर भवनों की वास्तविक स्थिति का आकलन करने तथा किसी दुर्घटना से पहले जोखिम दूर करने पर जोर दिया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रशासन को ऐसे निर्देश का इंतजार करना चाहिए था? मोतीपानी में पिछले 4 साल से जर्जर स्कूल भवन किसी अचानक सामने आई समस्या का नाग नहीं है। यह लंबे सगय से चली आ रही उस प्रशासनिक निगरानी की कमी की तस्वीर है, जिसमें एक स्कूल भवन की समय पर मरम्मत नहीं होने के कारण बच्चे सुरक्षित कक्षा की जगह गाय के कोठे में पढ़ने को मजबूर है। गरियाबंद जिले से सामने आई ये तस्वीर महज एक उदाहरण है, प्रदेश में आज भी ऐसे कई स्कूल है, जहां बच्चे जर्जर भवन या फिर गांव के किसी कोने या फिर पेड़ के नीचे पढ़ने को मजबूर है। बावजूद इसके जवाबदार अफसरों को ये नजारा नजर नहीं आता।
👉’हादसे के बाद जागने’ वाली व्यवस्था पर सवाल

दिल्ली के पीजी/हॉस्टल हादसे के बाद देशभर में जर्जर और जोखिमपूर्ण भवनों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। मुख्यमंत्री साय ने भी इसी संदर्भ में अधिकारियों को हादसे का इंतजार किए बिना पहले से कार्रवाई करने का संदेश दिया है। ऐसे में गरियाबंद का गोतीपानी का मामला सरकार और प्रशासन के लिए एक ग्राउंड टेस्ट जेसा है। सवाल केवल यह नहीं कि प्रदेश में कितने टकूल भवन जर्जर हैं। सवाल यह भी है कि कितने स्कूल भवन वर्षों से अधूरे पड़े हैं, कितने बच्चों को वैकल्पिक या असुरक्षित जगहों पर पढ़ाया जा रहा है और निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही आखिर कौन तय करेगा?
स्कूल भवन सिर्फ ईंट, सीगेंट और छत का ढांचा नहीं होता। यह बच्चों के भविष्य और उनके सुरक्षित वातावरण से जुड़ा बुनियादी अधिकार है। अगर एक जर्जर प्राथमिक स्कूल का मरम्मत चार साल में पूरा नहीं होता और अंततः गांव के पालकों को चंदा और श्रमदान से अस्थायी व्यवस्था करनी पड़ती है, तो यह सरकाटी योजनाओं की निगरानी और क्रियान्वयन व्यवस्था पर गंभीर सवाल है। अब जरूरत सिर्फ निरीक्षण की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की है कि मोतीपानी का स्कूल चार साल तक अधूरा क्यों रहा, जिम्मेदार कौन है और बच्चों को स्थायी सुरक्षित भवन कब मिलेगा। क्योंकि मुख्यमंत्री का संदेश स्पष्ट है-हादसे का इंतजार नहीं, हादसे से पहले कार्रवाही अब देखना यही है कि यह निर्देश कागजों से निकलकर गरियाबंद के मोतीपानी जैसे गांवों तक कब पहुंचता है।
