FSSAI का कड़ा एक्शन,6 महीने तक केशिशुओं के खाने में छिपी सुक्रोज और फ्रुक्टोज मिलाने पर पूरी रोक लगाने का मसौदा जारी, जानें नए सख्त नियम…

दिल्ली । बच्चों के खाने में मिलाई जाने वाली चीनी को लेकर बड़ी बहस छिड़ी है, और अब खुद खाद्य नियामक भी सख्त रुख अपना रहा है। fssai baby food sugar ban प्रस्ताव के तहत भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने छह महीने तक के शिशुओं के बेबी फूड में सुक्रोज और फ्रुक्टोज मिलाने पर पूरी रोक लगाने का मसौदा जारी कर दिया है।

15 अक्टूबर 2026 की इस ड्राफ्ट अधिसूचना को 16 अक्टूबर को भारत के राजपत्र में प्रकाशित किया गया, और अगले दिन इस पर आधिकारिक बयान भी सामने आया।

मसौदे का सीधा मतलब है – इस उम्र वर्ग के उत्पादों में ये दोनों तरह की चीनी अब नहीं डाली जानी चाहिए। अगर ये संशोधन अंतिम रूप ले लेता है, तो बेबी फूड बनाने वाली कंपनियां इस उम्र वर्ग के उत्पादों में सुक्रोज या फ्रुक्टोज का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगी। ये बदलाव ‘शिशु पोषण के लिए खाद्य पदार्थ संशोधन विनियम, 2026’ के तहत प्रस्तावित किया गया है।

👉मौजूदा नियमों में क्या छूट थी, अब क्या बदलने जा रहा है

मौजूदा नियमों की बात करें तो ‘शिशु पोषण के लिए खाद्य पदार्थ’ विनियम, 2020 में कंपनियों को कार्बोहाइड्रेट के मुख्य स्रोत के तौर पर लैक्टोज और ग्लूकोज पॉलिमर की सलाह दी गई है। हालांकि, एक छूट भी थी – जरूरत पड़ने पर कंपनियां तय सीमा के अंदर रहकर सुक्रोज और फ्रुक्टोज का इस्तेमाल कर सकती थीं। नया मसौदा छह महीने तक के शिशुओं वाले उत्पादों से इसी छूट को हटाने की बात कहता है।
दरअसल, मौजूदा नियम शून्य से दो साल तक की उम्र के बच्चों के शिशु आहार की पोषण संरचना, गुणवत्ता और सुरक्षा की विस्तृत शर्तें तय करते हैं। लेकिन प्रस्तावित संशोधन सिर्फ सबसे छोटे उम्र वर्ग – जन्म से छह महीने तक – पर केंद्रित है। छह महीने से 24 महीने तक के बच्चों के उत्पादों में तय सीमा के भीतर इन शर्कराओं का इस्तेमाल फिलहाल जारी रह सकता है।

👉पहले छह महीनों में अतिरिक्त चीनी क्यों खतरनाक मानी जा रही है

नियामक का कहना है कि जन्म के बाद के शुरुआती छह महीने बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास की नींव रखते हैं। इस दौर में सही और पर्याप्त पोषण की भूमिका बेहद निर्णायक होती है। प्रस्ताव का मकसद यही पक्का करना है कि छोटे शिशुओं के उत्पाद उनकी पोषण जरूरतों को ऐसी चीनी मिलाए बिना पूरा करें, जिसकी असल में वहां कोई जरूरत ही नहीं है।
असल में, ये कदम जन-स्वास्थ्य की उसी बड़ी मुहिम से जुड़ा है जो नवजातों को शुरुआती उम्र में ही मीठे के संपर्क से दूर रखने की वकालत करती है। कम उम्र से मीठे का स्वाद लगना बचपन में मोटापे और उससे जुड़ी दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ा सकता है। यही वजह है कि नियामक वैज्ञानिक आधार पर नियमों को और कड़ा करना चाहता है।

बताया जा रहा है कि ये प्रस्ताव उन स्थापित स्वास्थ्य दिशा-निर्देशों से भी मेल खाता है, जिनके तहत शुरुआती छह महीनों तक बच्चे को सिर्फ मां के दूध पर रखने की सलाह दी जाती है। गौरतलब है कि 2024 में एक अंतरराष्ट्रीय जांच में सामने आया था कि भारत के कुछ शिशु आहार उत्पादों में यूरोप के मुकाबले ज्यादा अतिरिक्त चीनी पाई गई थी। इस खुलासे के बाद नियामक ने शिशु आहार में मिली चीनी की मात्रा पर अध्ययन शुरू किया था।

👉कंपनियों पर क्या असर पड़ेगा और आगे की राह क्या है

अब सवाल ये है कि आगे क्या होगा। नियामक ने मसौदा सार्वजनिक कर दिया है ताकि हितधारकों की राय ली जा सके। राजपत्र जनता के लिए उपलब्ध होने की तारीख से 60 दिनों के भीतर कोई भी व्यक्ति या संगठन अपनी आपत्तियां और सुझाव भेज सकता है। तय समय-सीमा में मिले सुझावों की समीक्षा के बाद ही संशोधन को अंतिम रूप दिया जाएगा।

अधिकारियों के अनुसार, ये बदलाव विज्ञान-आधारित खाद्य सुरक्षा नियमों को आगे बढ़ाने और जिम्मेदार उत्पादन पद्धतियों को बढ़ावा देने की कोशिशों का हिस्सा हैं। बेबी फूड कंपनियों को अब अपने सबसे छोटे उपभोक्ताओं के उत्पादों की रेसिपी पर फिर से विचार करना पड़ सकता है। फिलहाल गेंद हितधारकों के पाले में है – 60 दिन की राय अवधि के बाद ही तय होगा कि प्रस्ताव कानून बनता है या उसमें कुछ बदलाव होता है।