कोरबा । आकांक्षी जिला कोरबा में हेल्थ सिस्टम वेंटिलेटर पर है, यहां मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 13 माह की एक मासूम बच्ची की मौत ने संवेदनहीनता और लापरवाही पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सामान्य सर्दी-खांसी की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचे परिजनों को क्या पता था कि इलाज के नाम पर उनकी बच्ची की जिंदगी दांव पर लग जाएगी। आरोप है कि भाप देने के लिए भर्ती की गई बच्ची को ट्रेनी नर्स ने गलत तरीके से कैनुला लगाया। जिसके बाद उसकी हालत बिगड़ती चली गई और वह कोमा में चली गई। 6 दिन तक जिंदगी और मौत से जूझने के बाद मासूम ने दम तोड़ दिया। बच्ची की मौत से दुःखी परिजनों ने जब लापरवाही के आरोप लगाये, तो अस्पताल अधीक्षक ने जांच का भरोसा देने के बजाय परिजनों से बदसलूकी करते हुए …’जो करना है कर लो’ कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया।
गौरतलब है कि सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर लाख दावें किये जाते है, लेकिन जमीनी हकीकत काफी भयावह है। ताजा मामला कोरबा के सबसे बड़े मेडिकल कालेज अस्पताल का है। बताया जा रहा है कि बरमपुर वार्ड क्रमांक 61 में संजू केंवट का परिवार निवास करता है। उसकी 13 माह की बेटी वान्या केंवट को सर्दी-खांसी की समस्या थी। 20 फरवरी को संजू केंवट अपनी पत्नी प्रियंका के साथ बीमार बेटी के लिए इलाज के लिए मेडिकल कालेज अस्पताल पहुंचा था। अस्पताल में बच्ची के प्राथमिक उपचार के बाद डाॅक्टर ने बच्ची को भाप देने से जल्दी आराम मिलने का सुझाव देते हुए अस्पताल में भर्ती कराने की सलाह दी थी।
बच्ची को जल्दी स्वास्थ्य लाभ मिलने की बात सुनकर परिजनों ने बच्ची को अस्पताल में एडमिट कराने के लिए तैयार हो गये। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में बच्ची के भर्ती होते हुए उन्हे बच्ची के हाथ में कैनुला लगाने के लिए इमरजेंसी वार्ड में भेज दिया गया। जहां एक ट्रेनी नर्स द्वारा बच्ची को कैनुला लगाने के दौरान बच्ची काफी तेज रोने लगी। परिजनों के इंकार करने के बाद भी नर्स ने बच्ची को जबरन कैनुला लगाया गया। जिसके कुछ देर बाद ही बच्ची अचेत हो गयी। परिजनों का आरोप है कि बच्ची के बेहोश होते ही डाॅक्टरों की टीम उसे तुरंत आईसीयू में एडमिट कर दिया गया। इस दौरान बच्ची की हालत लगातार बिगड़ती गयी और वह कोमा में चली गयी।
👉बच्ची के क्रिटिकल होने के बाद भी 4 दिनों तक समय बर्बाद किया

सामान्य सर्दी-खांसी से पीड़ित बच्ची के कोमा में चले जाने और हालत में सुधार नहीं होने से परिजन काफी परेशान थे। एक दिन पहले ही पीड़ित परिजनों ने कलेक्टर कुणाल दुदावत से मुलाकात कर बेटी के बेहतर इलाज के लिए गुहार लगाते हुए डाॅक्टरों पर लापरवाही का गंभीर आरोप लगाया था। कलेक्टर कुणाल दुदावत ने इस मामले में मेडिकल कालेज प्रबंधन से बच्ची के बेहतर उपचार के निर्देश दिये थे। लेकिन 24 फरवरी की रात ही बच्ची ने दम तोड़ दिया। परिजनों का आरोप है कि बच्ची के भर्ती होने के दिन ही कैनुला लगाने के बाद उसकी हालत बिगड़ गयी थी। बावजूद इसके अस्पताल के डाॅक्टर बच्ची को आईसीयू में भर्ती कर समय बर्बाद करते रहे। यदि समय रहते बच्ची को हायर सेंटर रेफर किया गया होता, तो आज उनकी बच्ची की जान बच सकती थी। लेकिन अस्पताल प्रबंधन अपनी गलती पर पर्दा डालने के लिए एक के बाद एक गलती करता रहा और अंत में बच्ची को जान से हाथ धोना पड़ गया।
👉अस्पताल अधीक्षक की संवेदनहीनता ने किया शर्मसार

मेडिकल कालेज अस्पताल में इकलौती बच्ची की मौत के बाद गरीब परिजन टूट गये। उन्हे इस बात का विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस बच्ची को उन्होने हस्ते-खेलते अस्पताल में बेहतर इलाज के लिए भर्ती कराया था, उसी अस्पताल की बीमार सिस्टम उसकी जान का दुश्मन बन जायेगा। इस घटना से नाराज पीड़ित बच्ची के माता-पिता और बस्ती के लोगों ने शव लेने से इंकार कर दिया और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग पर अड़ गये। इस दौरान अस्पताल अधीक्षक गोपाल कंवर दूसरे डाॅक्टरों के साथ मौके पर पहुंचे। परिजन जब अपनी तकलीफ डाॅक्टर कंवर को बता रहे थे।
तब वह इस मामले की जांच का आश्वासन देने के बजाये परिजनों से ही बहस करते दिखे। इस दौरान गोपाल कंवर और उनके साथ मौजूद दूसरे स्टाफ विवाद बढ़ने पर संवेदनहीनता दिखाते हुए पीड़ित परिवार की तकलीफ सुनने के बजाये उन्हे….‘जो करना है कर लो’ कहकर अपना पल्ला झाड़ते नजर आये। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिये है। क्या इस मामले में निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी ? या फिर यह मामला भी समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा, यह देखना बाकी है। फिलहाल एक मासूम की मौत ने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
