KORBA : चेक बाउंस मामले में बड़ी कार्रवाई , ट्रांसपोर्टर को 2 साल की कैद , 16 लाख का अर्थदंड …

कोरबा। सत्या ट्रकिंग प्राईवेट लिमिटेड बनाम अपूर्व वासन के विचाराधीन चेक बाउंस मामले में दोषसिद्धि हुई है। पूर्व में 28 दिसम्बर 2020 को न्यायालय प्रथम श्रेणी से दोषमुक्ति के निर्णय उपरांत व्यथित होकर की गई अपील पर फैसला आते ही आरोपी को न्यायिक रिमांड पर जेल दाखिल करने की कार्रवाई की गई।

👉यह है मामला

न्यायालयीन सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार परिवादी संस्था सत्या ट्रकिंग द्वारा एम.एन. अंसारी को प्रकरण से संबंधित संपूर्ण कार्य करने हेतु अधिकृत किया गया है। परिवादी संस्था भारत बेंझ कंपनी के भारी वाहनों का अधिकृत विक्रेता और वाहनों की सर्विस प्रदान करने का व्यवसाय करता है। अभियुक्त अपूर्व वासन ट्रांसपोर्टिंग का व्यवसाय करता है और समय-समय पर अपने वाहनों को मरम्मत के लिए परिवादी संस्था में लाता है, जिसका हिसाब परिवादी अपने अभिलेख में इन्द्राज कर समय-समय पर राशि प्राप्त करता है। वाहनों की मरम्मत की आंशिक भुगतान हेतु अभियुक्त ने परिवादी को अपने भारतीय स्टेट बैंक शाखा कोरबा, में स्थित अपने खाते का चैक रकम 9,83,166 रूपये दिनाँकित 20.09.2016 भुगतान हेतु प्रदान किया था। 03.10.2016 को परिवादी ने उक्त चैक को भारतीय स्टेट बैंक सिटी ब्रांच कोरबा में जमा किया, जो बैंक द्वारा भुगतान रोके जाने के कारण भुगतान होना संभव न हो पाना कहते हुए परिवादी को वापस कर दिया गया। उक्त रिटर्न मेमो प्राप्ति पश्चात् परिवादी द्वारा अधिवक्ता के माध्यम से दिनाँक 07.10.2016 को अभियुक्त को ऋण राशि भुगतान करने एवं कथित चेक अनादरण होने की सूचना दी गई। अभियुक्त इस बात की भली भांति जानकारी रखते हुए कि उसके द्वारा दिए गए चैक से परिवादी को भुगतान राशि प्राप्त होना है, तथापि अभियुक्त ने भुगतान रोके जाने का निर्देश देकर परिवादी के साथ कपट करते हुए उसे हानि पहुंचाई है। उपरोक्त आधारों पर परिवादी द्वारा अधिनियम की धारा 138 के तहत परिवाद विशेष न्यायाधीश (एससी -एसटी एक्ट) जयदीप गर्ग के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

👉आरोपी पक्ष ने दी अपनी सफाई

अभियुक्त अपूर्व वासन की तरफ से न्यायालय को बताया गया कि परिवादी कंपनी व हैम्लर इंडिया के साथ मीटिंग में सत्या ट्रकिंग से लिए गए कल-पुर्जे का हिसाब 14 लाख 83 हजार 166 रूपए मैनेजर श्री अंसारी के द्वारा बताया गया।अभियुक्त के द्वारा तत्काल पाँच लाख रूपए का चेक दिनांकित 26-08-2016 परिवादी को दे दिया गया। परिवादीके द्वारा प्रेषित जवाबी मेल में यह सूचित किया गया कि, अभियुक्त के द्वारा जो कल-पुर्जे उन्हें वापस किए गए हैं उसका बिल जेनरेट नहीं हुआ है और फाईनल बिल 9 लाख 83 हजार 166 रूपए है। अभियुक्त के द्वारा वापस किए गए सामानों का बिल उक्त बिल में घटाने के लिए कहा गया, जिस पर परिवादी श्री अंसारी के द्वारा अभियुक्त को आश्वासन दिया गया, जिस पर विश्वास करते हुए अभियुक्त के द्वारा बतौर सुरक्षा निधि उक्त राशि का चेक उन्हें दिनांक अंकित किए बिना जारी किया गया।

👉 इन्होंने स्वीकार किया

दूसरी तरफ विचारण के दौरान अभियुक्त द्वारा अपने बचाव कथन के प्रतिपरीक्षण में स्वीकार किया गया कि उसके द्वारा चेक में परिवादी कंपनी का नाम लिखा गया था तथा हस्ताक्षर किये गये थे। स्वीकार किया गया कि चेक अनादरित होने के पश्चात परिवादी के अधिवक्ता द्वारा विधिक सूचना पत्र भेजा गया था जो उसे प्राप्त हुआ था। अभियुक्त के पिता गुलशन वासन व मैनेजर द्वारा भी स्वीकार किया गया कि 14,83.166/- रुपये का भुगतान करना बनता था।

👉 Stop Payment किया जाना धोखा

विशेष न्यायालय ने कहा कि उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित न्याय दृष्टान्तों के आलोक में Stop Payment किये जाने के समय अभियुक्त के खाते में चेक की राशि से अधिक राशि होने के प्रमाणन का भार अभियुक्त पर था, परंतु अभियुक्त द्वारा अपने बचाव साक्ष्य में अपने बैंक खाता की सत्यापित प्रति प्रस्तुत नहीं की गई एवं अपने बैंक के किसी अधिकारी का कथन नहीं कराया गया। इस प्रकार अभियुक्त यह प्रमाणित करने में असफल रहा कि चेक अनादरण के समय उसके खाता में चेक राशि से अधिक राशि थी। अतः अभियुक्त द्वारा चेक की Stop Payment किया जाना एक धोखा मात्र प्रतीत होता है।
इसके अतिरिक्त अभियुक्त द्वारा विधिक नोटिस प्राप्त होने के उपरांत परिवादी को कोई जवाब नहीं भेजा गया। उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित न्याय दृष्टांत Rangappa v. Sri Mohan के आलोक में विधिक नोटिस का जवाब नहीं देने के कारण परिवादी के पक्ष में सत्यता प्रतीत होती है। एक अन्य न्याय दृष्टांत के आलोक में किसी कानूनी रूप से वसूले जा सकने वाले कर्ज या देनदारी के होने को गलत साबित करने की जिम्मेदारी अभियुक्त पर थी परंतु अभियुक्त उपरोक्त तथ्य प्रमाणित करने में असफल रहा है।कथनों से ही यह प्रमाणित हुआ कि परिवादी की ओर अभियुक्त की विधिक देनदारी थी एवं उसने बिल का हिसाब समझने के बाद ही चेक परिवादी कंपनी को प्रदान किया था।अभियुक्त को धारा 138 पराक्रम्य लिखित अधिनियम के अंतर्गत दोषसिद्ध किया गया है।

👉 दिया गया निर्णय,2 साल की सजा

न्यायाधीश ने कहा कि- चेक की राशि 9 लाख 83 हजार 166 रूपये पर जारी चेक की तिथि 20.09.2016 से निर्णय दिनांक तक लगभग 9.5 वर्ष बीत गये हैं। यदि 07 प्रतिशत वार्षिक की की दर से साधारण ब्याज जोड़ा जाये तो मूल धन एवं ब्याज की राशि का योग तथा मुकदमे के खर्च को मिलाकर कुल योग 16 लाख रुपये से अधिक राशि एवं प्रकरण के विचारण एवं अपील में लगे हुये अत्याधिक समय तथा प्रकरण की अन्य परिस्थितियों पर विचारोपरांत दंडित किया गया है। अभियुक्त को पराक्रम्य अधिनियम की धारा 138 में 2 वर्ष के सश्रम कारावास तथा 16 लाख रुपये अर्थदण्ड की सजा से दण्डित किया गया है। अर्थदण्ड के व्यतिक्रम में 2 वर्ष का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।