सपुरन कुलदीप 00
रायपुर/कोरबा। भारतीय संसदीय लोकतंत्र आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ भविष्य के सुधारों की चमक तो दिखाई दे रही है, लेकिन उनके पीछे छिपे आर्थिक और राजनीतिक जोखिमों पर बहस अनिवार्य है। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित 131वें संविधान संशोधन विधेयक, 2026 और परिसीमन विधेयक, 2026 ने देश के लोकतांत्रिक ढांचे को पूरी तरह बदलने की तैयारी कर ली है। प्रस्ताव के अनुसार, लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने और महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने की योजना है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या महिला सशक्तिकरण के पावन उद्देश्य की आड़ में ‘वोट की राजनीति’ का एक नया खेल खेला जा रहा है?
👉त्रि-स्तरीय विस्तार: संसद से विधानसभा तक का बोझ
सरकार की योजना केवल लोकसभा तक सीमित नहीं है। परिसीमन का यह ‘विस्फोट’ राज्यों की विधानसभाओं और राज्यसभा में भी दिखेगा:
👉विधानसभाओं का फैलाव: लोकसभा सीटों के अनुपात में राज्यों की विधानसभा सीटें भी 30% से 50% तक बढ़ जाएंगी। अकेले उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में विधायकों की संख्या 600 के पार पहुँच सकती है।
👉राज्यसभा का बढ़ता आकार: विधानसभा सीटों में वृद्धि का सीधा असर राज्यसभा (उच्च सदन) पर पड़ेगा, जहाँ सदस्यों की संख्या वर्तमान 245 से बढ़कर 400 के करीब पहुँच सकती है।
👉आर्थिक बोझ: जनता के टैक्स पर ‘सफेद हाथी’

एक सांसद या विधायक पर होने वाला खर्च केवल उसके वेतन तक सीमित नहीं होता। उनके आवास, सुरक्षा, यात्रा भत्ते और सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र विकास निधि (MPLAD) पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये खर्च होते हैं।
300 से अधिक नए लोकसभा सांसद और हज़ारों नए विधायकों की फौज खड़ी करने का अर्थ है—देश के राजकोष पर अरबों रुपये का अतिरिक्त स्थायी भार।
जहाँ देश को बेहतर शिक्षा, आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी ढाँचे की ज़रूरत है, वहाँ जनता के टैक्स का पैसा ‘जनप्रतिनिधियों की संख्या’ बढ़ाने में झोंकना कितना तर्कसंगत है?
👉सशक्तिकरण या चुनावी गणित?
इस भारी-भरकम वृद्धि के पीछे ‘वोट बैंक’ की राजनीति स्पष्ट दिखाई देती है। इसके तीन मुख्य पहलू हैं:
👉कार्यकर्ताओं का समायोजन: सीटों की संख्या बढ़ाकर राजनीतिक दल अपने उन महत्वाकांक्षी नेताओं को संतुष्ट करना चाहते हैं जिन्हें वर्तमान व्यवस्था में टिकट नहीं मिल पाता। यह ‘जनता की सेवा’ से ज्यादा ‘पार्टी कैडर मैनेजमेंट’ का तरीका है।
👉उत्तर-दक्षिण का असंतुलन: जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ने से उन राज्यों को फायदा होगा जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में कोताही बरती, जबकि दक्षिण भारतीय राज्य (जिन्होंने प्रभावी ढंग से आबादी रोकी) राजनीतिक रूप से हाशिए पर चले जाएंगे। यह देश की अखंडता और संघीय ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती है।
👉सत्ता का केंद्रीकरण: सीटों की संख्या बढ़ाने से बड़े दलों को अपने बहुमत का आंकड़ा सुरक्षित करने में आसानी होगी, जिससे छोटे क्षेत्रीय दलों की भूमिका कम हो सकती है।
👉विकल्प: वर्तमान सीटों पर ही आरक्षण क्यों नहीं?
यदि सरकार की नीयत वास्तव में महिलाओं को संसद पहुँचाने की है, तो इसके लिए नई सीटें बनाने की प्रतीक्षा करना और परिसीमन का बहाना बनाना अनावश्यक है।
👉रोटेशन प्रणाली: वर्तमान 543 सीटों में ही रोटेशन के आधार पर 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकती थीं। इससे न तो अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ता और न ही उत्तर-दक्षिण का विवाद पैदा होता।
👉तत्काल कार्यान्वयन: परिसीमन और जनगणना एक लंबी प्रक्रिया है। वर्तमान ढांचे में आरक्षण लागू करने से ‘नारी शक्ति’ को तुरंत हक मिल सकता था।
👉निष्कर्ष : लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का अर्थ ‘भीड़ बढ़ाना’ नहीं, बल्कि ‘गुणवत्ता बढ़ाना’ होना चाहिए। महिला आरक्षण एक ऐतिहासिक अनिवार्यता है, लेकिन इसे राजनीतिक लाभ और वोट बैंक के विस्तार का जरिया बनाना लोकतंत्र के साथ छलावा है। यदि हम कम खर्च में और बिना किसी क्षेत्रीय असंतुलन के महिलाओं को संसद तक पहुँचा सकें, तो वही सच्चे अर्थों में ‘नारी शक्ति’ और ‘राष्ट्र शक्ति’ का सम्मान होगा। सरकार को आत्ममंथन करना चाहिए कि वह ‘लोकतंत्र को मजबूत’ कर रही है या केवल ‘सत्ता के गणित’ को?
सोर्स – सत्यसंवाद डॉट कॉम
