कोरबा। एक निजी जमीन पाम मॉल के भीतर आ जाने के बाद से इस जमीन को मॉल की चारदीवारी से बाहर और दूर दिखाने की संचालकों व राजस्व विभाग सहित पुलिस की कोशिश लगातार जारी है। दूसरी तरफ भू स्वामी का पुत्र अपनी जमीन के लिए लगातार कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। इस जमीन को लेकर किए गए दस्तावेजी हेर फेर पर दर्ज मामले को जहां पुलिस जांच में किसी तरह का अपराध नहीं होना बता कर राजस्व विभाग से प्राप्त प्रतिवेदन के आधार पर तीसरे प्रयास में एफआईआर के खात्मा खारिजी का आदेश कोरबा न्यायालय से पारित करा लिया गया। अब इस आदेश को हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया है। सीधे एसपी की निगरानी में फिर से जांच 60 दिन के भीतर करने के निर्देश दिए गए हैं। जारी आदेश में फरियादी के द्वारा प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों का भी अवलोकन करने कहा गया है जिसे कोतवाली पुलिस अब तक दरकिनार /नजरअंदाज करती आई है। इस मामले में यह कहना गलत नहीं होगा कि कृष्णा बिल्डकॉन को प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचाने की मंशा से जांच के नियम-कायदों और तथ्यों को ताक पर रखने का काम राजस्व विभाग और कोतवाली पुलिस कर रही है।

हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल के समक्ष याचिकाकर्ता अंकित सिंह ने स्वयं उपस्थित हो कर अपना पक्ष मजबूती से रखा।
कोरबा के पावर हाउस रोड से टीपी नगर के मध्य स्थित जमीन खसरा नं. 663/3 पर फर्जी राजस्व दस्तावेजों से कब्जा बदलने और जालसाजी का आरोप पर थाना कोतवाली कोरबा में अपराध क्रमांक 1085/2020 पर धारा 420, 465, 467, 468, 471 IPC के तहत FIR दर्ज हुई है। इस मामले में आज तक पुलिस आरोपी निर्धारित नहीं कर पाई है,तो दूसरी तरफ पुलिस ने इस मामले में अज्ञात आरोपी के विरुद्ध किसी भी तरह का अपराधिक कृत्य नहीं होना बताते हुए जांच बंद करने की रिपोर्ट “क्लोजर रिपोर्ट” (खात्मा खारिजी) कोर्ट में पेश की थी।
👉🏻 हाईकोर्ट की अवहेलना
प्रकरण में दिनांक 28.04.2026 को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोरबा ने शिकायतकर्ता अंकित सिंह और उनकी माँ को सुने बिना ही पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली। जबकि उच्च न्यायालय ने आदेश दिनाँक 22.04.2026 को WPCr No. 221/2026 में स्पष्ट आदेश दिया था कि “सभी पक्षों को सुनकर निर्णय लिया जाए।
👉 अपील में इन सबको बनाया प्रतिवादी
CJM के इस निर्णय से क्षुब्ध होकर अंकित सिंह ने हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस की डबल बेंच के समक्ष अपना आवेदन प्रस्तुत कर इस आदेश को निरस्त करने का आग्रह किया। अंकित सिंह ने इस मामले में
1- छत्तीसगढ़ राज्य, सेक्रेटरी, होम डिपार्टमेंट, मंत्रालय, महानदी भवन, 2- पुलिस डायरेक्टर जनरल, पुलिस हेड क्वार्टर,3- पुलिस इंस्पेक्टर जनरल, बिलासपुर रेंज,4- कमिश्नर, बिलासपुर डिवीज़न,5- एडिशनल डायरेक्टर, एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट, 2nd फ्लोर, नेताजी सुभाष स्टेडियम, मोती बाग, रायपुर,6- कलेक्टर, कोरबा,7- सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस, कोरबा, 8- सिटी सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस, कोरबा,9- स्टेशन हाउस ऑफिसर, पुलिस स्टेशन, थाना, कोतवाली, कोरबा को भी प्रतिवादी बनाया।
🖊️ डबल बेंच ने दिए यह आदेश

हमने पक्षकारों को सुना तथा अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री का परिशीलन किया। अभिलेख के परिशीलन से यह स्पष्ट है कि विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा आक्षेपित आदेश दिनांक 28.04.2026 याचिकाकर्ता एवं उसकी माता को सुनवाई का अवसर प्रदान किए बिना पारित किया गया है, जबकि इस न्यायालय द्वारा रिट याचिका (सी.आर.) क्रमांक 221/2026 में दिनांक 22.04.2026 को स्पष्ट निर्देश दिया गया था।
👉 यह सुस्थापित विधि है कि अंतिम प्रतिवेदन/क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करने से पूर्व शिकायतकर्ता/सूचनाकर्ता को सुना जाना आवश्यक है। भगवंत सिंह बनाम कमिश्नर ऑफ पुलिस, दिल्ली, (1985) 2 SCC 537 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि मजिस्ट्रेट द्वारा अंतिम प्रतिवेदन स्वीकार करने से पूर्व सूचनाकर्ता को नोटिस दिया जाना चाहिए तथा उसे सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए।
👉 वर्तमान मामले में, विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा आक्षेपित आदेश न केवल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है अपितु न्यायिक अनुशासन का भी उल्लंघन है, क्योंकि इस न्यायालय के पूर्व आदेश की अवहेलना की गई है। एस.एल. कपूर बनाम जगमोहन, (1980) 4 SCC 379 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन न करना स्वयं में अन्याय है।
👉यह भी उल्लेखनीय है कि पूर्व में विद्वान न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, कोरबा द्वारा आदेश दिनांक 10.11.2025 तथा विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा आदेश दिनांक 20.02.2026 में जांच के तरीके पर स्पष्ट असंतोष व्यक्त किया गया था तथा यह अंकित किया गया था कि राजस्व अभिलेखों में जालसाजी की उचित जांच नहीं की गई है। इसके बावजूद बिना कोई अतिरिक्त जांच किए पुनः वही क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई तथा उसे स्वीकार कर लिया गया।
👉 उपरोक्त चर्चा के आलोक में, हमारा सुविचारित मत है कि विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कोरबा द्वारा पारित आक्षेपित आदेश दिनांक 28.04.2026 विधि की दृष्टि में टिकाऊ नहीं है तथा अपास्त किए जाने योग्य है।
👉 परिणामस्वरूप, रिट याचिका (सी.आर.) स्वीकार की जाती है। विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कोरबा द्वारा अपराध क्रमांक 1085/2020 में पारित आक्षेपित आदेश दिनांक 28.04.2026 एतद्वारा अपास्त किया जाता है। मामला विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कोरबा को प्रतिप्रेषित किया जाता है कि वे याचिकाकर्ता को सुनकर विधि अनुसार नए सिरे से क्लोजर रिपोर्ट पर निर्णय लें।
🫵 पुलिस अधीक्षक, कोरबा को निर्देशित किया जाता है कि वे विद्वान न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, कोरबा के आदेश दिनांक 10.11.2025 तथा याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों को दृष्टिगत रखते हुए मामले की निष्पक्ष, पक्षपात रहित एवं प्रभावी अग्रिम जांच सुनिश्चित करें तथा पूरक रिपोर्ट यथासंभव 60 दिवस के भीतर संबंधित न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें। विनय त्यागी बनाम इरशाद अली, (2013) 5 SCC 762 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि निष्पक्ष जांच संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है।
👉यह स्पष्ट किया जाता है कि हमने मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है तथा विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विधि अनुसार स्वतंत्र रूप से निर्णय लेंगे। इसके साथ, रिट याचिका (सी.आर.) निस्तारित की जाती है।
सोर्स -सत्यसंवाद डॉट कॉम
