कोरबा । सरकारी इंजीनियरों की इंजीनियरिंग का जवाब ही नहीं हैै…! कागजों में सब कुछ ‘विश्वस्तरीय‘ और जमीनी हकीकत ऐसी कि पहली ही बारिश में करोड़ों रुपए की परियोजना पानी-पानी हो जाए। जीं हां कोरबा जिले में इसका ताजा नमूना दीपका-कुचैना मार्ग पर बने नए अंडरपास में देखने को मिला, जहां मानसून की पहली तेज बारिश ने निर्माण की पूरी कहानी सबके सामने ला दी। बारिश के दौरान स्थिति कुछ ऐसी बनी कि कुछ ही मिनटों में पूरा अंडरपास तालाब में तब्दिल हो गया और अंडरपास की दीवारों से पानी झरने की तरह बहता रहा।

कोरबा को दीपका-कुचैना क्षेेत्र से जोड़ने वाले जिस अंडरपास को लोगों की सुविधा और सुरक्षित आवागमन के लिए बनाया गया था। वह पहली बारिश में ही लोगों की परीक्षा लेने लगा। ऊपर से पानी झरने की तरह बहता रहा और नीचे अंडरपास में पानी भरता रहा। नजारा ऐसा था, मानो किसी पर्यटन स्थल का कृत्रिम वॉटरफॉल तैयार कर दिया गया हो। फर्क सिर्फ इतना था कि यहां लोग घूमने नहीं, बल्कि अपनी जान जोखिम में डालकर गुजरने को मजबूर थे।
गर्मी के दिनों में जिस अंडरपास ब्रिज मार्ग की तारीफ हो रही थी, बारिश आते ही उसी सड़क ने सरकारी निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर दिए। कुछ ही देर की बारिश में पूरा अंडरपास जलमग्न हो गया। सड़क गायब हो गई और उसकी जगह एक गहरा जलाशय दिखाई देने लगा। हालात ऐसे बने कि बाइक सवार पानी के तेज बहाव के बीच किसी तरह रास्ता पार करते नजर आए। यात्रियों से भरी एक बस भी पानी से लबालब भरे अंडरपास में उतर गई। जिससे बस में बैठे लोगों की कुछ देर के लिए सांसें थम गईं थी। जलभराव बढ़ने के बाद दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं।
लोग घंटों जाम में फंसे रहे, लेकिन सवाल वही है कि करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी क्या इतनी सामान्य बात का अनुमान नहीं लगाया गया कि बारिश का पानी निकलेगा कहां ? स्थानीय लोगों का कहना है कि पहली ही बारिश ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता और इंजीनियरिंग की पोल खोल दी। ऐसे में लोगों के दिमाग में एक ही सवाल घूूम रहा हैै कि जब कुछ घंटों की बारिश में अंडरपास तालाब बन गया, तो पूरे मानसून में यहां क्या हाल होगा ? आखिर करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी जल निकासी की व्यवस्था क्यों नहीं की गई ? यह दृश्य सिर्फ एक अंडरपास का नहीं, बल्कि सरकारी निर्माण कार्यों की प्लानिंग और उसके क्रियान्वयन पर भी बड़ा सवाल है।
जब योजनाएं फाइलों में परफेक्ट हों और जमीन पर पहली बारिश में ही फेेल होे जाये, तो नुकसान सिर्फ सरकारी खजाने का नहीं, बल्कि आम लोगों के समय, सुरक्षा और भरोसे का भी होता है। अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार विभाग इस वॉटरफॉल अंडरपास को इंजीनियरिंग की उपलब्धि मानता है या अपनी बड़ी चूक स्वीकार कर लोगों को राहत देने के लिए ठोस कदम उठाता है, येे तोे आने वाला वक्त ही बतायेगा। फिलहाल पहली बारिश ने इतना जरूर बता दिया है कि इस अंडरपास की सबसे बड़ी मजबूती उसकी दीवारें नहीं, बल्कि उस पर उठ रहे सवाल हैं।
सोर्स -dwhindi.com
