देश में क्या इस वजह से बढ़ रहे चीनी के दाम? एथनॉल नीति, अल नीनो और गन्ने के घटते रकबे पर छिड़ी बहस…

महाराष्ट्र । देश में चीनी की बढ़ती कीमतों के लिए पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि एथनॉल की बढ़ती मांग के कारण चीनी उत्पादन प्रभावित हुआ और इसका सीधा असर उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ा। हालांकि, केंद्रीय मंत्री प्रल्हाद जोशी ने कहा कि रेड रोट बीमारी और अल नीनो प्रभाव के चलते कम बारिश की वजह से गन्ने की फसल पर बुरा असर पड़ा और पैदावार घट गई। इस वजह से चीनी का उत्पादन कम हुआ है।

वहीं, चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी की मौजूदा कीमतों के पीछे गन्ने की खेती का घटता रकबा, कम उत्पादन, छोटा होता पेराई सत्र, चीनी की जमाखोरी और निर्यात जैसे कई कारण हैं।

👉अल नीनो प्रभाव से कृषि उत्पादन पर बुरा असर- जोशी

केंद्रीय मंत्री ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि अल नीनो प्रभाव की वजह से केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में कृषि उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है। उन्होंने कहा कि सरकार ने आगामी त्योहारी सीजन के लिए कई उपाय किए हैं, जिसमें अस्थायी तौर पर चीनी आयात भी शामिल है। उन्होंने कहा कि देश में सालाना 280 लाख टन चीनी की खपत होती है। फिलहाल, देश में 20-25 लाख टन चीनी सरप्लस है।

👉कांग्रेस ने सरकार पर लगाए आरोप

कांग्रेस के महासचिव और सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने आरोप लगाया कि गन्ना किसानों को भुगतान में देरी के चलते किसानों का गन्ने की खेती से मोहभंग हो चुका है। सांसद मनीष तिवारी ने चीनी, आलू, प्याज और लेहसुन जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में उछाल को लेकर सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि जिस गन्ने को चीनी बनाने में लगाना चाहिए, सरकार उसे वाहनों के ईंधन में खपा रही है।

👉गन्ने का रकबा और उत्पादन दोनों लगातार घट रहे’

महाराष्ट्र के पूर्व गन्ना आयुक्त शेखर गायकवाड़ ने कहा कि गन्ने का रकबा और उत्पादन दोनों लगातार घट रहे हैं। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश में गन्ने की खेती का रकबा 2022-23 में करीब 59 लाख हेक्टेयर था, जो 2024-25 में घटकर करीब 54.5 लाख हेक्टेयर रह गया। यानी दो साल में करीब 4.5 लाख हेक्टेयर की कमी आई। इसी अवधि में गन्ने का कुल उत्पादन भी करीब 49 करोड़ टन से घटकर करीब 45.3 करोड़ टन रह गया। इसका सीधा असर चीनी की उपलब्धता पर पड़ना स्वाभाविक है।

👉नई नीति का असर तुरंत नहीं दिखेगा-गायकवाड़

गायकवाड़ के अनुसार, गन्ने और चीनी उत्पादन को बढ़ाने के लिए बनाई गई किसी नई नीति का असर तुरंत नहीं दिखेगा। इसके लिए कम से कम तीन साल लग सकते हैं। इसलिए सरकार को चीनी के उत्पादन और उपलब्ध स्टॉक पर लगातार नजर रखनी होगी।

👉चीनी मिलों का पेराई सत्र छोटा हो गया-दांडेगांवकर

कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज की नेशनल फेडरेशन के पूर्व अध्यक्ष जयप्रकाश दांडेगांवकर ने कहा कि महाराष्ट्र में भी चीनी मिलों का पेराई सत्र छोटा हो गया है। जिन मिलों में पहले करीब 150 दिन तक पेराई होती थी, वहां अब यह अवधि करीब 100 दिन रह गई है।

उनके मुताबिक, गन्ना किसानों को मिलने वाला उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) और चीनी का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिलों के लिए आर्थिक दबाव पैदा कर रहा है। मौजूदा एफआरपी करीब 3,600 रुपये प्रति टन है, जबकि चीनी का एमएसपी 3,100 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास है।

दोनों की इकाइयां अलग होने के कारण इस अंतर की तुलना सावधानी से करनी चाहिए, लेकिन मिलों की लागत और बिक्री मूल्य के बीच दबाव जरूर है।

👉चीनी की महंगाई का मुख्य कारण एथनॉल नहीं- भैरवनाथ थोंब्रे

पश्चिम भारत चीनी मिल संघ के अध्यक्ष भैरवनाथ थोंब्रे ने भी एथनॉल को चीनी की महंगाई का मुख्य कारण मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि 2020 में एथनॉल का बड़ा हिस्सा चीनी के डायवर्जन से बनता था, जबकि अब इसमें अनाज की हिस्सेदारी काफी बढ़ गई है।