दिल्ली -महाराष्ट्र-कर्नाटक । कुछ महीने पहले तक भारत में चीनी का एक बहुत ही शानदार सीजन होने की तैयारी चल रही थी। उत्पादन के अनुमान काफी बेहतर थे, निर्यात को सरकार की तरफ से हरी झंडी दे दी गई थी और राशन या किराना दुकानों की अलमारियों में क्या पहुंचेगा, इसे लेकर किसी को कोई खास चिंता नहीं थी।
लेकिन फिर अचानक आंकड़े बिगड़ने लगे।
👉एक साथ टकराईं कई समस्याएं

महाराष्ट्र और कर्नाटक में बारिश से तबाह हुए खेत, उत्तर प्रदेश की गन्ना पट्टी में तबाही मचाती एक फफूंद वाली बीमारी, त्योहारी सीजन के दौरान तेजी से बढ़ती मांग, जमाखोरी की उठती फुसफुसाहट और एक एथेनॉल कार्यक्रम जो हर किसी का पसंदीदा बलि का बकरा बन चुका है, यह सब एक साथ आपस में टकरा गए।
👉एक साल में एक-तिहाई बढ़ीं कीमतें
इसका नतीजा यह निकला कि चीनी की कीमतों में एक साल के भीतर लगभग एक-तिहाई की बढ़ोतरी हो चुकी है और अब सरकार इस जिन्न को वापस बोतल में बंद करने के लिए हाथ-पांव मार रही है। जानिए यह सब कैसे हुआ और एथेनॉल की कहानी उतनी सरल क्यों नहीं है जितनी यह सुनने में लगती है।
👉क्या कहते हैं चीनी के आधिकारिक आंकड़े
23 अगस्त को खुदरा चीनी की कीमत लगभग 62.47 रुपये प्रति किलो थी, जो एक साल पहले इसी समय 46.30 रुपये थी। इसी अवधि के दौरान थोक कीमतें भी बिल्कुल उसी रफ्तार से बढ़ीं और 4,313 रुपये से बढ़कर 5,801 रुपये प्रति 100 किलो यानी प्रति क्विंटल पर पहुंच गईं।
👉वादे और हकीकत के बीच बड़ा अंतर
सरकार अब इस सीजन के कुल चीनी उत्पादन का अनुमान लगभग 30.6 मिलियन टन लगा रही है। यह गन्ने की खेती करने वाले राज्यों द्वारा मूल रूप से लगाए गए 34.3 मिलियन टन के शुरुआती अनुमान से काफी बड़ी गिरावट है। वादे और हकीकत के बीच का यही अंतर असल में इस पूरे संकट की असली शुरुआत है।
👉फसल के साथ आखिर क्या गलत हुआ
यह सिर्फ एक खराब फसल की बात नहीं थी, बल्कि अलग-अलग राज्यों में एक साथ कई तरह की दिक्कतें आईं। देश के दो सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र और कर्नाटक में दक्षिण-पश्चिम मानसून अपने तय समय से ज्यादा रुका रहा, जिसने सितंबर और अक्टूबर के दौरान बहुत ज्यादा बारिश कर दी।
👉गन्ने में घट गई सुक्रोज की मात्रा
खेतों में पानी भरा रहने और हल्की धूप मिलने का मतलब यह हुआ कि गन्ना अपने भीतर पर्याप्त मात्रा में सुक्रोज यानी मिठास नहीं बना सका। इससे गन्ने की उपज गिर गई और चीनी मिलों को पेराई किए गए प्रति टन गन्ने से उतनी चीनी निकालने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।
👉उत्तर प्रदेश में बीमारी ने मचाई तबाही
उत्तर प्रदेश की एक अलग ही सिरदर्दी थी। वहां रेड रॉट नाम की फफूंद वाली बीमारी ने खेतों को तबाह कर दिया, खासकर बड़े पैमाने पर बोई जाने वाली गन्ने की सीओ-0238 किस्म को। इसके साथ ही टॉप शूट बोरर नाम के कीट ने भी फसल को काफी नुकसान पहुंचाया।
👉मांग बढ़ते ही गिरता चला गया उत्पादन
इन तीनों राज्यों को एक साथ मिला दें तो आपको एक ऐसा उत्पादन अनुमान मिलता है जो पूरे सीजन में लगातार नीचे की ओर खिसकता चला गया, और वह भी ठीक उसी समय जब बाजार में मांग तेजी से बढ़ रही थी।
👉तो क्या एथेनॉल ही असली विलेन है
यह वह हिस्सा है जिस पर हर कोई बहस कर रहा है, और उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि एथेनॉल इस खेल में मुख्य विलेन नहीं बल्कि केवल एक सहायक किरदार की तरह है। इस सीजन में लगभग 30 लाख टन चीनी को एथेनॉल उत्पादन में डायवर्ट यानी इस्तेमाल किया गया था।
👉आंकड़ों की बड़ी तस्वीर क्या बताती है
यह सुनने में बहुत बड़ी मात्रा लगती है और आलोचकों ने इसी को पकड़कर यह कहना शुरू कर दिया कि बाजारों में चीनी कम होने और कीमतें बढ़ने की वजह यही है। लेकिन इसे बड़ी तस्वीर के साथ रखकर देखिए। कुल चीनी का उत्पादन शुरुआत में जताए गए अनुमान से 34.5 लाख टन कम रहा। यह कमी एथेनॉल में भेजी गई पूरी चीनी की मात्रा से भी ज्यादा बड़ी है।
👉गन्ने के बजाय मक्के से बनने लगा एथेनॉल
सरल शब्दों में कहें तो फसल ने उम्मीद से कहीं ज्यादा खराब प्रदर्शन किया, जो एथेनॉल द्वारा ली गई मात्रा से अधिक था। सरकार यह भी बताती है कि एथेनॉल में चीनी की हिस्सेदारी असल में 2022-23 के लगभग 12 फीसदी से घटकर इस सीजन में करीब 9 फीसदी पर आ गई है, क्योंकि भारत अब एथेनॉल के लिए गन्ने के बजाय मुख्य रूप से मक्के जैसे अनाज का रुख कर रहा है। देश का लगभग तीन-चौथाई एथेनॉल अब अनाज से आता है, न कि गन्ने से।
👉एथेनॉल पर पूरा दोष मढ़ना गलत
इनमें से कोई भी बात एथेनॉल को पूरी तरह से निर्दोष साबित नहीं करती है, लेकिन इसका मतलब यह जरूर है कि कीमत में आई इस पूरी तेजी का ठीकरा सिर्फ ब्लेंडिंग प्रोग्राम पर फोड़ना पूरे मामले को जरूरत से ज्यादा सरल बनाकर देखना है।
👉विशेषज्ञ और कृषि कार्यकर्ता क्या कह रहे हैं
हर कोई इस बात से सहमत नहीं है कि यह संकट वास्तव में मौसम या एथेनॉल की वजह से ही है। महाराष्ट्र के कृषि कार्यकर्ता विजय जावंधिया ने ‘द फेडरल’ से बात करते हुए तर्क दिया कि असली और गहरा मुद्दा चीनी क्षेत्र पर सरकार का दशकों पुराना नियंत्रण है। 1990 के दशक से उदारीकरण की बातें होने के बावजूद यह बाजार कभी वास्तव में आजाद नहीं रहा।
👉बफर स्टॉक न होने का पड़ा बुरा असर
उनकी आलोचना यह है कि जब भारत के पास सरप्लस यानी ज्यादा चीनी थी, तो सरकार ने सब्सिडी देकर निर्यात को बढ़ावा दिया, लेकिन कभी गेहूं और चावल की तरह चीनी का बफर स्टॉक तैयार नहीं किया। इसलिए जब दो-तीन साल पहले उत्पादन गिरना शुरू हुआ और इस साल के मौसम ने इसे और खराब कर दिया, तो सहारा लेने के लिए कोई बफर स्टॉक मौजूद नहीं था।
👉जमाखोरी को लेकर जावंधिया की थ्योरी
जमाखोरी के पहलू पर भी उनकी एक थ्योरी है। व्यापारी तब जमाखोरी नहीं करते जब आपूर्ति सामान्य दिखती है, वे तब जमाखोरी करते हैं जब उन्हें आने वाले संकट या किल्लत का अहसास होता है। जावंधिया ने कहा, “जमाखोरी के लक्षण देखने के बाद स्टॉक लिमिट तय करने की सरकार की अपनी घोषणा ने ही व्यापारियों को और अधिक स्टॉक रोके रखने के लिए डरा दिया होगा।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि शुरुआत में सरकार जमाखोरों के खिलाफ कार्रवाई करने में धीमी रही होगी, लेकिन हालिया सख्त कदमों की वजह से कीमतों में पहले ही 7 से 8 रुपये प्रति किलो तक की नरमी आ चुकी है।
👉सरकार ने संकट से निपटने के लिए क्या किया
👉बढ़ती कीमतों और घटते स्टॉक का सामना करते हुए केंद्र सरकार ने एक साथ कई कदम उठाए हैं:
👉निर्यात पर प्रतिबंध: चीनी के निर्यात पर 30 सितंबर 2026 तक रोक लगा दी गई है।
👉आयात की छूट: 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन तक कच्ची चीनी बिना किसी सीमा शुल्क के आ सकती है, जो कि सामान्य 100 फीसदी आयात शुल्क से एक बड़ा बदलाव है।
👉स्टॉक की सीमा तय: 28 जुलाई से व्यापारी 400 टन से अधिक चीनी नहीं रख सकते हैं, और न ही 30 दिनों से अधिक समय तक कोई स्टॉक रख सकते हैं।
👉पारदर्शिता पर जोर: 13 अगस्त से मिलों को 2025-26 के के दौरान 500 टन या उससे अधिक चीनी खरीदने वाले किसी भी थोक खरीदार का विवरण देना अनिवार्य कर दिया गया है।
👉आगे क्या होने की उम्मीद है
आयात शुरू होने और पेराई का नया सीजन शुरू होने के साथ अब बड़ा सवाल यह है कि क्या ये उपाय वास्तव में चीनी की कीमतों को नीचे ला पाएंगे, वह भी सरकार को अपने व्यापक एथेनॉल-ब्लेंडिंग लक्ष्यों से पीछे हटने के लिए मजबूर किए बिना। फिलहाल यह एक नाजुक संतुलन साधने जैसा है: चीनी को किफायती रखना, एथेनॉल के लक्ष्यों को जीवित रखना और यह उम्मीद करना कि अगले सीजन की फसल कोई नया सरप्राइज न दे दे।
