CG : खाते खंगालने आएंगे ऑडिटर ,जनपद CEO बोले -चाय -नाश्ता, भोजन का करें इंतजाम,ऑडिट या सत्कार ,वायरल आदेश से उठे सवाल …

डोंगरगढ़। सरकारी व्यवस्था में ऑडिट का मकसद होता है सरकारी पैसों के खर्च, रिकॉर्ड और कामकाज की निष्पक्ष जांच। लेकिन डोंगरगढ़ जनपद पंचायत से जारी एक शासकीय ज्ञापन ने ऑडिट की प्रक्रिया से ज्यादा चाय-नाश्ते, भोजन और ठहरने की व्यवस्था को लेकर चर्चा छेड़ दी है।

24 अगस्त 2026 को जारी ज्ञापन में बताया गया है कि महालेखाकार (लेखापरीक्षा), छत्तीसगढ़ रायपुर की टीम 25 अगस्त से 1 सितंबर तक कार्यालयीन खातों का ऑडिट करेगी। इसके लिए ग्राम पंचायतों में ऑडिट टीम के भ्रमण, निरीक्षण एवं रहने के साथ-साथ भोजन, चाय और नाश्ते की आवश्यक व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए हैं।
यहीं से सवाल उठता है कि ऑडिट का असली केंद्र क्या होना चाहिए, सरकारी खातों की जांच या ऑडिट टीम की मेहमाननवाजी?

👉’ हिसाब’ देखने वालों का ‘खातिरदारी’ का इंतजाम कौन करेगा?

सरकारी कार्यालयों में निरीक्षण और ऑडिट सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है। संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों से सहयोग लेना भी स्वाभाविक है। लेकिन जब किसी आदेश में भ्रमण, निरीक्षण और ऑडिट के साथ भोजन, चाय-नाश्ता तथा विश्राम की व्यवस्था को बाकायदा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जाते हैं, तो व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना भी लाजिमी है।
खासकर तब, जब ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों, भुगतान, निर्माण और सरकारी योजनाओं के खर्च का वास्तविक हिसाब सामने लाने की जिम्मेदारी ऑडिट टीम की हो।

👉जनता के पैसे का हिसाब देखने निकलेगी टीम, खर्च का बोझ किस पर?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि ऑडिट टीम की इन व्यवस्थाओं का खर्च किस मद से और किस नियम के तहत किया जाएगा? ज्ञापन में व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश तो हैं, लेकिन आम जनता के लिए यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि चाय-नाश्ता, भोजन और ठहरने की व्यवस्था का भुगतान किस मद से होगा और इसकी जवाबदेही किसकी होगी?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पंचायत स्तर पर होने वाला हर खर्च अंततः सरकारी धन और जनता के पैसे से जुड़ा होता है।

👉सिस्टम से सवाल: ऑडिट निष्पक्ष हो, व्यवस्था भी पारदर्शी हो..ऑडिट टीम को सुविधाएं उपलब्ध कराने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, यदि यह निर्धारित नियमों और अधिकृत प्रक्रिया के तहत हो। लेकिन व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि ऑडिट की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करने की कोई गुंजाइश न बचे।
डोंगरगढ़ जनपद का यह आदेश अब इसी सवाल को जन्म दे रहा है कि जिस व्यवस्था को सरकारी खर्च का हिसाब मांगना है, उसी व्यवस्था में अपनी मेहमाननवाजी के खर्च का हिसाब सार्वजनिक करने की पारदर्शिता क्यों नहीं होनी चाहिए? ऑडिट जरूरी है, जांच जरूरी है और सरकारी पैसे का हिसाब भी जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि सिस्टम में ‘हिसाब लेने’ से पहले ‘खातिरदारी’ की परंपरा आखिर कब खत्म होगी?