केंद्र ने 30 गांवों के आदिवासियों की नहीं सुनी पुकार ,विरोध के बावजूद हसदेव अरण्य के परसा कोल ब्लॉक को दे दी अनुमति,841 हेक्टेयर वन भूमि में खनन से उजड़ेंगे 5 गांव, एक लाख पेंड

केंद्र ने 30 गांवों के आदिवासियों की नहीं सुनी पुकार ,विरोध के बावजूद हसदेव अरण्य के परसा कोल ब्लॉक को दे दी अनुमति,841 हेक्टेयर वन भूमि में खनन से उजड़ेंगे 5 गांव, एक लाख पेंड

हसदेव एक्सप्रेस न्यूज कोरबा –अंबिकापुर ।सुरम्य सघन वनों से आच्छादित एवं जैव विविधताओं से भरपूर हसदेव अरण्य को बचाने 30 गांवों के 350 आदिवासियों ने भूखे प्यासे 300 किलोमीटर की पदयात्रा कर राज्यपाल से मिलकर गुहार लगाई थी ,अब उसी हसदेव अरण्य को उजाड़ने केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी है। आदिवासियों के विरोध आपत्ति को दरकिनार कर केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने हसदेव अरण्य क्षेत्र में परसा कोल ब्लॉक को मंजूरी दे दी है। राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम को 841 हेक्टेयर वन भूमि में कोयला खनन की अनुमति दी गई है। इससे 2 गांव पूर्ण रूप से व 3 गांव आंशिक रूप से विस्थापित होंगे। छत्तीसगढ़ का फेफड़ा कहे जाने वाले हसदेव अरण्य के एक लाख पेंड उजड़ जाएंगे। केंद्र के इस फैसले के खिलाफ एक बार फिर हसदेव अरण्य बचाओ समिति के बैनर तले विरोध के स्वर फूटेंगे।

यहाँ बताना होगा कि सुरम्य सघन वनों से आच्छादित एवं जैव विविधताओं से भरपूर हसदेव अरण्य का इलाका छत्तीसगढ़ का फेफड़ा कहा जाता है।सन 2009 तत्कालीन यूपीए सरकार में इसे नो गो एरिया घोषित किया गया था।यानि इस क्षेत्र में खनन गतिविधियों को अनुमति नहीं थी। साल 2012 में जब परसा ईस्ट केते बासन खनन परियोजना को स्टेज -2 की वन स्वीकृति जारी की गई थी इस दौरान भी उसमें यह शर्त शामिल की गई थी कि हसदेव में किसी भी नई कोयला खदान को अनुमति नहीं दी जाएगी। केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद जब एनडीए की सरकार अस्तित्व में आई तो हसदेव अरण्य क्षेत्र में 6 कोल ब्लॉक खोलने की कवायद शुरू कर दी गई थी। जिसे देखते हुए सन 2015 में राहुल गांधी ने हसदेव अरण्य के समस्त ग्राम सभाओं के लोगों को संबोधित करते हुए उनके जल- जंगल -जमीन को बचाने के लिए संकल्प लिया था। यह भी कहा था कि वे इस संघर्ष में उनके साथ हैं। इन सबके बावजूद केंद्र सरकार अपने इरादों पर अडिग रही। और सुनियोजित तरीके से भोले भाले आदिवासियों को धोखे में रख फर्जी तरीके से ग्राम सभा के जरिए वन भूमि के डायवर्सन की प्रक्रिया पूरी करा ली।जब ग्रामीणों को इसकी भनक लगी तो हसदेव अरण्य समिति के बैनर तले आदिवासी ग्रामीण फर्जी ग्राम सभा दस्तावेजों को रद्द कर दोषी अधिकारियों पर लगातार कार्रवाई की मांग करते रहे। 2018 से हसदेव अरण्य क्षेत्र के आदिवासी समुदाय आंदोलन करते आ रहे हैं। इन मांगों को लेकर फतेहपुर में सन 2019 में 73 दिनों तक धरना प्रदर्शन किया गया था। पर प्रशासन की तरफ की कोई पहल या कार्रवाई नहीं की गई।कोयला खनन परियोजनाओं के विरोध में छत्तीसगढ़ के सरगुजा और कोरबा जिले के 30 गांवों के 350 ग्रामीण हफ्तों तक पैदल मार्च कर राजधानी पहुंचे थे। ग्रामीणों ने आदिवासियों ने इसका नाम हसदेव बचाओ पदयात्रा दिया था। ग्रामीणों ने बिना ग्राम सभा के जमीन अधिग्रहण को लेकर जमकर आक्रोश जताया था। राज्यपाल अनुसुइया उइके से भी मुलाकात की थी।लेकिन नतीजा सिफर रहा। अधिकारी अपनी ओछी चाल में कामयाब रहे और निहित स्वार्थ के लिए फर्जी ग्राम सभा का प्रस्ताव भेज दिया । जब तक ग्रामीणों को इसकी जानकारी मिली तब तक बहुत देर हो चुकी थी। राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम को सरगुजा स्थित परसा कोल ब्लॉक में खनन कार्य शुरू करने के लिए केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से क्लियरेंस मिल गई है।

2019 में जारी हुई थी स्टेज -1 की स्वीकृति ,ग्रामीणों ने की थी आपत्ति

राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम के लिए परसा कोयला खदान स्टेज-1 की स्वीकृति 13 फरवरी 2019 को जारी हुई थी। इस पर ग्रामीणों ने अपनी आपत्तियां लगाई थी। तय प्रावधानों के मुताबिक किसी भी परियोजना हेतु वन स्वीकृति के पूर्व ” वनाधिकार मान्यता कानून “के तहत वनाधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया की समाप्ति और ग्रामसभा की लिखित सहमति आवश्यक है। पांचवी अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी कानून से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया के पूर्व ग्रामसभा से अनिवार्य सहमति के प्रावधान को लागू करना आवश्यक है जिसका पालन नहीं किया गया । ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि आज भी उनके वनाधिकार के दावे लंबित हैं और 24 जनवरी 2018 ग्राम हरिहरपुर , 27 जनवरी 2018 साल्ही एवं 26 अगस्त 2017 को फतेहपुर गांव में दिखाई गई ग्रामसभाएं फर्जी थी ।यही नहीं
पांचवी अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी कानून से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया के पूर्व ग्रामसभा से अनिवार्य सहमति के प्रावधान को लागू करना आवश्यक है जिसका पालन नहीं किया गया । इसकी जांच के लिए मुख्यमंत्री और राज्यपाल को ज्ञापन सौंपे गए हैं।

परिस्थितिकी तंत्र को है खतरा

ग्रामीण हसदेव अरण्य क्षेत्र में चल रही और प्रस्तावित कोयला खनन परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं, जिसके बारे में उनका कहना है कि इससे राज्य के वन पारिस्थितिकी तंत्र को खतरा है। यह क्षेत्र जैव विविधता में समृद्ध है और हसदेव और मांड नदियों के लिए जलग्रहण क्षेत्र है, जो राज्य के उत्तरी और मध्य मैदानी इलाकों की सिंचाई करते हैं।

बिना ग्राम सभा भू – अधिग्रहण ,कूटरचित दस्तावेजों से ली पर्यावरणीय मंजूरी ग्रामीणों में आक्रोश

हसदेव अरण्य बचाओं संघर्ष समिति के अनुसार, दो जिलों के प्रदर्शनकारियों का एक संयुक्त मंच है, इनके विरोध के बावजूद इस क्षेत्र में छह कोल ब्लॉक आवंटित किए गए हैं। इनमें से दो में खनन चालू हो गया है। परसा पूर्व और केटे बसन ब्लॉक और चोटिया के ब्लॉक 1-2 है। इसके साथ ही परसा के दूसरे कोल ब्लॉक को पर्यावरण मंत्रालय से क्लियरेंस मिल गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि जमीन अधिग्रहण का काम बिना ग्राम सभा की अनुमति की गई है। साथ ही भूमि अधिग्रहण का काम भी जारी है। संघर्ष समिति के प्रमुख सदस्य उमेश्वर सिंह आर्मो ने आरोप लगाया है कि परसा में पर्यावरण मंजूरी के लिए जाली दस्तावेज का प्रयोग किया गया है। साथ ही मंत्रालय को गलत जानकारी दी गई है।

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