इंडस्ट्रियल एरिया खरमोरा के कैमिकल फैक्ट्री बंद कराने किसान हुए लामबन्द,दस सालों से मुआवजा नहीं बढाने से टूटा सब्र का बांध ,50 एकड़ खेतिहर भूमि बर्बाद कर डाली ,खुद फले फूले किसानों को भूले ,मुआवजा के नाम पर मजाक , पार्षद के नेतृत्व में दी आंदोलन की चेतावनी

इंडस्ट्रियल एरिया खरमोरा के कैमिकल फैक्ट्री बंद कराने किसान हुए लामबन्द,दस सालों से मुआवजा नहीं बढाने से टूटा सब्र का बांध ,50 एकड़ खेतिहर भूमि बर्बाद कर डाली ,खुद फले फूले किसानों को भूले ,मुआवजा के नाम पर मजाक , पार्षद के नेतृत्व में दी आंदोलन की चेतावनी

हसदेव एक्सप्रेस न्यूज कोरबा।(भुवनेश्वर महतो) । इंडस्ट्रियल एरिया खरमोरा में आबादी के बीच संचालित तीनों कैमिकल फैक्ट्री धीमी जहर उगल रहे। उद्योगों से निकलने वाले कैमिकल युक्त विषाक्त पानी खेतों में प्रवाहित होकर दर्जनों किसानों के 50 एकड़ से अधिक खेतिहर भूमि को बंजर बना चुका है ।फैक्ट्री संचालक तो साल दर साल उन्नति की राह पर अग्रसर हैं,लेकिन जिन्होंने अपने खेतिहर भूमि बर्बाद कर इनके उद्योगों को आबाद किया आज वही उद्योग उनकी सुध नहीं ले रहे। पिछले एक दशक से महज 8 हजार रुपए प्रति एकड़ की दर से मुआवजा प्रदान कर किसानों की मजबूरी का मजाक बना रहे। कैमिकल फैक्ट्री संचालकों की मनमानी एवं जिला प्रशासन, पर्यावरण विभाग की मौन स्वीकृति से आहत किसानों के समर्थन में स्थानीय पार्षद ने इस साल मुआवजा नहीं बढ़ाए जाने पर आंदोलन की चेतावनी तक दे डाली।

यहाँ बताना होगा कि सन 1979 में खरमोरा में उद्योग नीति के तहत 100 एकड़ नजूल भूमि को औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना के लिए लीज पर दिया गया था । 2 प्रतिशत वार्षिक भू -भाटक की दर पर 94 औद्योगिक इकाई यहाँ स्थापित हैं। कोर्ट केस की वजह से 3 उद्योग बन्द हैं। शेष संचालित 91 उद्योगों में कैमिकल्स ,फैब्रिकेशन ,फ्लाई ऐशब्रिक्स ,आरामशीन ,आक्सीजन प्लांट,इलेक्ट्रोड निर्माण के अलावा ,कूलर,आलमारी और पतंग बनाने वाले छोटे उद्योग शामिल हैं। पशुओं का आहार भी औद्योगिक क्षेत्र में बनाया जाता है। संयंत्रों में बड़े पैमाने पर कच्चे माल की खपत होती है । इसमें कोयला के अलावा अन्य सामग्री भी शामिल है। आबादी के बीच स्थापित कैमिकल्स फैक्ट्री की वजह से खरमोरा के दर्जनों किसानों का 50 एकड़ से अधिक खेतिहर भूमि भेंट चढ़ गई है।

उद्योगों से निकलने वाले रासायनिक पदार्थों से उपजाऊ भूमि बंजर बन गई है। कैमिकल्स फैक्ट्री का शुरुआती दौर से ही प्रभावित किसानों सहित स्थानीय निवासियों द्वारा विरोध किया जाता रहा है। लेकिन जिम्मेदार विभाग हमेशा जनता की आवाज एवं समस्याओं को अनसुना करता आया है। उद्योगों के पूंजीपति संचालकों ने अधिकारियों को अपने पक्ष में लेकर समय समय पर शिकायतों के आधार पर की जाने वाली जाँच को प्रभावित कर अपने पक्ष में करने में सफल रहे। आज आलम यह है कि प्रभावित किसान अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। हॉल ही के कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में आबादी का विस्तार भी हुआ है । साथ ही कैमिकल्स उद्योगों का उत्पादन भी बढ़ा है लिहाजा इसी अनुपात में प्रदूषण का स्तर भी बढ़ा है।जिसका विपरीत प्रभाव लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। यहाँ के बाशिंदों की फसल एवं उनकी जिंदगी के लिए नासूर बन चुके लघु उद्योगों के खिलाफ एक बार फिर जनाक्रोश फूट रहा। मुआवजा राशि नहीं बढ़ाए जाने पर किसानों व स्थानीय पार्षद ने आंदोलन तक की चेतावनी दे डाली। दरअसल पिछले एक दशक से अधिक समयावधि से कैमिकल उद्योग प्रभावित किसानों को महज 8 हजार रुपए प्रति एकड़ की दर से ही मुआवजा भुगतान कर रहे । जबकि इस दौरान महंगाई कई गुना बढ़ गई । स्वयं कैमिकल फैक्ट्री संचालकों का आय व उत्पादन कई गुना बढ़ गया। पर मुआवजा दर बढाने न तो कैमिकल फैक्ट्री ने रुचि दिखाई न ही प्रशासन ने संज्ञान लिया। अब नाराज किसान आंदोलन के मूड में हैं। प्रभावित किसानों की मानें तो उन्हें प्रति एकड़ महज 8 हजार का मुआवजा उद्योग प्रदान कर रहे हैं। जबकि प्रति एकड़ उन्हें आज 15 से 17 एकड़ धान की प्राप्ति होती। समर्थन मूल्य पर यह राशि 37 हजार रुपयों से अधिक होती। इस तरह उन्हें एक चौथाई मुआवजा ही मिल रहा।ऐसी अपुष्ट जानकारी सामने आई है कि तत्कालीन दौर में तत्कालीन एडीएम इफ्फ्त आरा की मौजूदगी में तीनों कैमिकल फैक्ट्री संचालक प्रति एकड़ 40 बोरा धान की अनुपात में मुआवजा देने,भूमि को उपजाऊ बनाने एवं नाला निर्माण के लिए सहमत थे। पर कतिपय भोले भाले आदिवासियों को चंद रुपयों का लालच देकर 8 हजार रुपए की दर से सहमति पत्र ले लिया गया। आक्रोशित किसानों के समर्थन में पीड़ित पार्षदों ने इस साल मुआवजा नहीं बढ़ाए जाने पर आंदोलन की चेतावनी दी है।

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पर्यावरण विभाग पर उठे सवाल,कैमिकल फैक्ट्री को थमाया नोटिस ,फिर भी नहीं सुधरे हालात

औद्योगिक क्षेत्र खरमोरा में संचालित कैमिकल्स फैक्ट्री संचालकों को संरक्षण देने आरोप पर्यावरण विभाग पर लगता रहा है।
क्षेत्रीय अधिकारी अंकुर साहू दफ्तर में बैठे बैठे कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे। गत वर्ष हसदेव एक्सप्रेस ने 23 जून 2021 को औद्योगिक क्षेत्र के केमिकल फैक्ट्री बंद करने की उठी पुकार ,50 एकड़ खेतिहर भूमि निकल जाने से आदिवासी किसान हुए लाचार नामक शीर्षक से प्रमुखता से समाचार प्रकाशन कर शासन प्रशासन का ध्यान आकृष्ट कराया था। खबर प्रकाशन उपरांत हो रही फजीहत को देखते हुए पर्यावरण विभाग ने 15 जुलाई 2021 को औचक निरीक्षण किया। तीनों कैमिकल फैक्ट्री पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण के स्थापित मानकों के अनुरूप संचालित नहीं पाए गए।पर्यावरण विभाग ने बिंदुवार खामियों के आधार पर व्यवस्था दुरुस्त करने 16 जुलाई 2021 को नोटिस जारी किया था। लेकिन यह नोटिस महज कागजी औपचारिकता साबित हुई। कैमिकल फैक्ट्री आज भी पुराने ढर्रे पर ही संचालित हैं। जिससे पर्यावरण विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे।

प्रभावित किसानों की सुनें👇

3 एकड़ खेतिहर भूमि निगल गई कैमिकल फैक्ट्री, मुआवजा बढ़ाएं या बंद करवाएं उद्योग

मैं 3 एकड़ भू-भाग में धान की फसल ले रहा था । वो जमीन कैमिकल्स फैक्ट्री निकल गई। मुआवजा के नाम पर मजाक किया जा रहा । महज 8 हजार रुपए प्रति एकड़ की दर से मुआवजा दे रहे। हमें प्रति एकड़ 15 क्विंटल की दर से 37 हजार मुआवजा मिलना चाहिए। जिला प्रशासन या तो मुआवजा दर बढ़ाए या फिर कैमिकल फैक्ट्री बंद करे।

सम्मान सिंह ,खरमोरा

एसिड प्रवाहित पानी ने बना दिया बंजर ,पर्याप्त मुआवजा भी नहीं दे रहे

कैमिकल फैक्ट्री की वजह से हर तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं हम आदिवासी किसानों की जमीन सरकार की अनदेखी से बंजर हो गई। एसिड प्रवाहित पानी से अन्न का एक दाना भी नहीं होता। 15 साल से फसल नहीं ले पा रहे। न पर्याप्त मुआवजा दे रहे न ही हमारी जमीन उपजाऊ बनाकर दे रहे।

नारायण सिंह

मुआवजा बढ़ाएं नहीं तो करेंगे आंदोलन

प्रभावित किसानों को बहुत कम मुआवजा मिल रहा। लंबे अर्से से हम मुआवजा बढाने का प्रयास कर रहे पर मुआवजा बढ़ाने का नाम नहीं ले रहे। शीघ्र इस साल मुआवजा बढ़ाएं अन्यथा हम जनहित में आंदोलन को बाध्य होंगे। प्रशासन पर्यावरण विभाग के अधिकारी झांकने तक नहीं पहुंचते।

श्रीमती अनीता यादव, पार्षद खरमोरा

कोरबा