सूरजपुर। छत्तीसगढ़ सरकार की सबसे संवेदनशील और महत्वाकांक्षी योजना गर्भवती महिलाओं, बच्चों और किशोरी बालिकाओं को पोषण देने वाली रेडी-टू-ईट योजना प्रतापपुर में पूरी तरह से दम तोड़ती नजर आ रही है। महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के गृह जिले सूरजपुर से लगे प्रतापपुर में जो खुलासा हुआ है, उसने न सिर्फ शासन-प्रशासन की नींद उड़ाई है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि आखिर गरीब, गर्भवती माताओं और बच्चों के हिस्से का पोषण किसकी तिजोरी भर रहा है ?
तीन दिन पूर्व प्रशासन ने रेवटी गांव में धान की कालाबाजारी करने वाले कोचियों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए व्यवसायी राधेश्याम गुप्ता के गोदाम पर छापा मारा। इस छापेमारी में जो सामने आया, वह किसी घोटाले से कम नहीं था। गोदाम से 1000 बोरी अवैध धान, 58 बोरी महिला एवं बाल विकास विभाग का रेडी-टू-ईट पोषक आहार और 8 बोरी गरीबों को मिलने वाला पीडीएस चावल बरामद किया गया। यह बरामदगी सीधे तौर पर सरकारी योजनाओं की खुली लूट और संगठित भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इतनी बड़ी मात्रा में रेडी-टू-ईट पकड़े जाने के बावजूद महिला एवं बाल विकास विभाग न तो जागा, न ही शर्मिंदा हुआ. जिला स्तर से लेकर ब्लॉक स्तर तक के अधिकारी इस पूरे मामले में मूक दर्शक बने हुए हैं। न तो अब तक विभागीय जांच शुरू हुई है, न ही थाना में एफआईआर दर्ज कराने के लिए कोई लिखित शिकायत दी गई है। सवाल यह है कि जब गर्भवती महिलाओं को मिलने वाला पोषण कोचिया के गोदाम से बरामद हो रहा है, तब भी विभाग किसके दबाव में चुप बैठा है?
रेडी-टू-ईट का इस तरह खुलेआम धान कोचियों के पास मिलना यह साबित करता है कि योजना सिर्फ कागजों में चल रही है। जमीनी हकीकत यह है कि गर्भवती माताओं और बच्चों के नाम पर आने वाला पोषण बेचा जा रहा है और उनकी सेहत के साथ खुला खिलवाड़ किया जा रहा है। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध है, जिसमें विभागीय अधिकारी, कर्मचारी और रेडी-टू-ईट समूहों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
इसी गोदाम से पीडीएस चावल और अवैध धान की बरामदगी ने यह भी साफ कर दिया है कि प्रतापपुर में कालाबाजारी कोई छोटी-मोटी घटना नहीं, बल्कि एक गहरी जड़ें जमाए बैठा नेटवर्क है. गरीबों के हक का चावल, किसानों का धान और महिलाओं-बच्चों का पोषण तीनों को मिलाकर बाजार में बेचा जा रहा है और प्रशासन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति कर रहा है। सूत्रों के अनुसार, इस पूरे मामले को नेतागिरी और ऊंची पकड़ का रौब दिखाकर ठंडे बस्ते में डालने की कोशिशें तेज हो गई हैं। यही कारण है कि कार्रवाई के बाद भी महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
चंदौरा थाना प्रभारी मनोज सिंह ने साफ कहा है कि महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से अब तक अपराध पंजीबद्ध कराने के लिए कोई आवेदन नहीं दिया गया है। शिकायत मिलने पर ही एफआईआर दर्ज की जाएगी। यह बयान अपने आप में विभाग की चुप्पी और गैरजिम्मेदारी को उजागर करता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि मंत्री के गृह जिले से सटे इलाके में अधिकारी इतने बेलगाम कैसे हो गए? क्या उन्हें न शासन का डर है, न कानून का? यदि इतनी बड़ी बरामदगी के बाद भी कार्रवाई नहीं होती, तो यह स्पष्ट संकेत है कि महिला एवं बाल विकास विभाग प्रतापपुर में पूरी तरह से धरातल से गायब हो चुका है। यह मामला अब सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि गर्भवती माताओं, बच्चों और गरीबों के साथ किए जा रहे अमानवीय अपराध का बन चुका है। यदि अब भी सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह घोटाला आने वाले समय में शासन की साख पर गहरा सवाल खड़ा करेगा।
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