कोरबा। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग के अधीन संचालित स्वर्गीय बिसाहु दास महंत स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय एवं संबद्ध अस्पताल, कोरबा में सुरक्षा सेवाओं के लिए जारी किया गया टेंडर अब केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक पूर्वनियोजित और नियंत्रित प्रक्रिया का संकेत देता दिखाई दे रहा है। जांच में सामने आए तथ्यों से यह साफ होता जा रहा है कि टेंडर की टाइमिंग, शर्तें और प्रक्रियाएं इस तरह तय की गईं, जिससे प्रतिस्पर्धा सीमित रहे और लाभ कुछ चुनिंदा एजेंसियों तक सिमट जाए।
👉 2026 में टेंडर, लेकिन GST रिटर्न 2023-24 तक सीमित
सूत्र बताते है कि जनवरी 2026 में जारी इस टेंडर में बोलीदाताओं से GST रिटर्न केवल वित्तीय वर्ष 2023-24 तक का ही प्रमाण मांगा गया है। जबकि वित्तीय वर्ष 2024-25 समाप्त हो चुका है और 2025-26 प्रगति में है। सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया में नवीनतम उपलब्ध GST रिटर्न मांगा जाना चाहिए, ताकि बोलीदाता की वर्तमान वित्तीय स्थिति स्पष्ट हो सके। ऐसे में दो वर्ष पुराने रिटर्न को ही मानक बनाना इस संदेह को जन्म देता है कि यह शर्त किसी विशेष एजेंसी की पात्रता को ध्यान में रखकर तय की गई।
👉नया टेंडर नहीं, पहले एक साल तक एक्सटेंशन का सहारा
सूत्रों के अनुसार मेडिकल कॉलेज में सुरक्षा सेवाओं का ठेका लगभग एक वर्ष तक एक्सटेंशन के सहारे चलाया गया। जबकि सुरक्षा जैसी सतत और संवेदनशील सेवा में समय पर नई निविदा जारी किया जाना अनिवार्य माना जाता है। लंबे समय तक एक्सटेंशन देना न केवल वित्तीय नियमों के विपरीत है, बल्कि इससे पुराने ठेकेदार को बिना प्रतिस्पर्धा अनुचित लाभ मिलने की आशंका भी पैदा होती है। सवाल यह है कि समय रहते नया टेंडर क्यों नहीं निकाला गया और किसके संरक्षण में यह व्यवस्था चलती रही।
👉गुपचुप तरीके से कराई गई प्री-बिड मीटिंग

इस पूरे मामले में सबसे गंभीर और चौंकाने वाला पहलू टेंडर लगने के 7 दिन के भीतर ही कराई गई प्री-बिड मीटिंग है। सूत्र बताते हैं कि यह प्री-बिड मीटिंग न तो व्यापक रूप से सार्वजनिक की गई और न ही सभी संभावित बोलीदाताओं को इसकी समान सूचना दी गई। प्री-बिड मीटिंग में नहीं आने वाले वेंडर को डिसक्वालिफाई कर दिया जाता है। पारदर्शी प्रक्रिया में प्री-बिड का उद्देश्य सभी प्रतिभागियों को समान जानकारी देना होता है, लेकिन यहां यह प्रक्रिया बंद कमरे की कवायद बनकर रह गई। आरोप है कि प्री-बिड के जरिए टेंडर की शर्तों को इस तरह अंतिम रूप दिया गया, जिससे पहले से तय एजेंसियों के अनुरूप पात्रता मापदंड फिट बैठ सकें।
👉MSME और स्टार्टअप के लिए पहले से बंद दरवाजे
टेंडर दस्तावेज में कई स्थानों पर स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है कि MSME और स्टार्टअप को किसी भी प्रकार की छूट नहीं दी जाएगी। चाहे अनुभव हो, टर्नओवर हो या फिर EMD—हर स्तर पर नए और छोटे उद्यमों को बाहर कर दिया गया है। जबकि केंद्र सरकार और GeM पोर्टल की नीतियां MSME और स्टार्टअप को सरकारी खरीद प्रक्रिया में बढ़ावा देने के लिए बनाई गई हैं। इसके बावजूद ऐसी कठोर शर्तें नीति के उलट जाकर प्रतिस्पर्धा को सीमित करती नजर आती हैं।
👉7.20 लाख की EMD और संकीर्ण अनुभव की शर्तें
सुरक्षा सेवाओं जैसी श्रम आधारित सेवा के लिए 7.20 लाख की भारी EMD तय की गई है, जिसे डिमांड ड्राफ्ट, ऑनलाइन और हार्डकॉपी—तीनों माध्यमों से जमा करना अनिवार्य किया गया है। यह शर्त छोटे और मध्यम सुरक्षा सेवा प्रदाताओं के लिए लगभग असंभव बाधा बन जाती है। इसके साथ ही केवल 100 बेड से अधिक वाले अस्पताल में 01 जनवरी 2020 के बाद का अनुभव ही मान्य करना यह संकेत देता है कि टेंडर की डिजाइनिंग बेहद संकीर्ण दायरे में की गई है।
👉योग्य होकर भी बाहर करने का खुला अधिकार
टेंडर की एक शर्त यह भी कहती है कि सभी मापदंड पूरे करने के बावजूद किसी भी बोलीदाता को बिना कारण बताए अयोग्य घोषित किया जा सकता है। यह प्रावधान पूरी निविदा प्रक्रिया को प्रशासनिक विवेक के नाम पर मनमानी के हवाले कर देता है और पारदर्शिता पर सीधा सवाल खड़ा करता है।
👉 प्रशासन के सामने सीधे सवाल
पुराने GST रिटर्न की मांग, एक साल तक नियम विरुद्ध एक्सटेंशन, MSME–स्टार्टअप विरोधी शर्तें, भारी EMD और गुपचुप प्री-बिड मीटिंग—ये सभी तथ्य मिलकर यह संकेत देते हैं कि कोरबा मेडिकल कॉलेज का सुरक्षा टेंडर अब केवल ठेका नहीं, बल्कि गंभीर जांच का विषय बन चुका है। अब देखना यह होगा कि स्वास्थ्य विभाग और मेडिकल कॉलेज प्रशासन इन तथ्यों पर क्या जवाब देता है, या फिर यह मामला भी फाइलों और औपचारिकताओं के बीच दबा दिया जाएगा।
