KORBA : प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाभियान के तहत पीवीटीजी बसाहट कोरवापारा – बांसाखार तक बन रही सड़क की गुणवत्ता और निगरानी पर उठ रहे सवाल ! अनुबंध मियाद से 6 माह पिछड़ गया है कार्य,कब सुध लेंगे जिम्मेदार

कोरबा। बीहड़ और दुर्गम जंगलों में रहने वाले वनवासियों, विशेष संरक्षित जनजातियों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने तथा उनका आवागमन सुगम करने के लिए विभिन्न योजनाओं पर केंद्र सरकार की मदद से राज्य सरकार कार्य कर रही है। इन कार्यों के लिए केंद्र से राशि योजना अंतर्गत प्राप्त हो रही है। भारत सरकार के वित्तीय पोषित योजनाओं के तहत कोरबा में भी कार्य हो रहा है लेकिन ऐसे कार्यों में गुणवत्ता और मापदंड का ना तो ख्याल रखा जा रहा और न ही संबंधित विभाग/ निर्माण एजेंसी के द्वारा मौके पर कोई निगरानी कराई जा रही है। इसकी वजह से वनांचल क्षेत्र में लंबे अरसे और प्रयासों के बाद शुरू हुए कार्यों की गुणवत्ता के साथ-साथ लंबे समय तक मिलने वाले लाभ और टिकाऊपन को लेकर सवाल उठना लाजिमी है।

हम बात कर रहे हैं कोरबा जिले के रामपुर विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत ग्राम बताती से बांसाखार मेन रोड व्हाया कोरवापारा के मध्य बन रही 8.70 किलोमीटर लंबी सड़क की। यह सड़क निर्माण कार्य अपनी पूर्णता तिथि 27 सितंबर 2025 से 6 माह पीछे चल रहा है। 28 सितंबर 2024 को यह कार्य प्रारंभ होने के साथ 27 सितंबर 2025 को पूर्ण हो जाना चाहिए था। अग्रिम 5 साल संधारण अवधि 27 सितंबर 2030 तक निर्धारित है। ठेकेदार श्री साईं एसोसिएट रायगढ़ के द्वारा यह कार्य किया जा रहा है। कार्य का निष्पादन कार्यपालन अभियंता/परियोजना क्रियान्वयन इकाई छग ग्राम सड़क विकास अधिकारी कोरबा हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय भारत सरकार द्वारा वित्तीय पोषित अंतर्गत प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाभियान के तहत पीवीटीजी बसाहट कोरवापारा (जनसंख्या 13), बांसाखार(जनसंख्या 116) के लिए यह 8.70 किलोमीटर लंबी सड़क निर्माण राशि 534.28 लाख निर्धारित है। 5 वर्ष के लिए संधारण राशि 41.07 लाख अनुबंध है।

👉ना कोई इंजीनियर मिला ना सुपरवाइजर, कोई संपर्क सूत्र भी नहीं

कार्य का अनुबंध के अनुसार यह निर्माण कार्य पूर्णता दिनाँक के 6 महीने बाद अभी भी कराया जा रहा है। जानकारों की मानें तो सड़क निर्माण गुणवत्ताहीन कराया जा रहा है। उक्त कार्य में पुल-पुलिया निर्माण के साथ रिटर्निग वॉल का भी निर्माण कराया जा रहा है किन्तु इसमें वाईब्रेटर का उपयोग नहीं किया जा रहा है। सीमेंट भी मापदंड के अनुरूप नहीं डाला जा रहा है एवं गुणवत्ताहीन सीमेंट का उपयोग करने की बातें सामने आ रही है। इस कार्य के संबंध में तथा गुणवत्ता को लेकर मौके पर विभाग का इंजीनियर अथवा सुपरवाइजर दूर-दूर तक नजर नहीं आया।

काम कर रहे मजदूरों से जब जानकारी लेने का प्रयास किया गया तो वह कुछ भी बता नहीं सके कि ठेकेदार कौन है, सुपरवाइजर कौन है, साहब कब-कब निरीक्षण करने आते हैं आदि कोई जानकारी उनके पास नहीं थी। यहां तक कि उनके पास ना तो सुपरवाइजर का मोबाइल नंबर मिला और नहीं ठेकेदार का कोई संपर्क सूत्र। जब हमारे समाचार सहयोगी ने कार्यस्थल के आसपास लगे कार्य संबंधी बोर्ड का अवलोकन किया तो उसमें ना तो विभागीय अधिकारी न इंजीनियर और ना ही ठेकेदार का कोई संपर्क सूत्र मोबाइल नंबर लिखा नजर आया। ऐसे में आखिर गुणवत्ता और मापदंड को लेकर कोई बात करें तो किससे करें?

👉 लंबे समय तक लाभ मिलने की गारंटी नहीं

हमारे समाचार सहयोगी ने बताया कि जिस तरह से यहां काफी पतली परत पर निर्माण किया जा रहा है उसके अनुसार कोई संदेह नहीं कि विशेष पिछड़ी जनजाति परिवार के लोगों को इस सड़क का लंबे समय तक लाभ मिल पाएगा। संभवत: पहली ही बारिश में यह सड़क उखड़ सकती है या जगह-जगह से गड्ढों में तब्दील हो सकती है। पुल-पुलिया के निर्माण में मसाला भरने के बाद वाइब्रेटर का उपयोग नहीं किया जा रहा है जिससे इसकी मजबूती और सघनता पर भी सवाल उठ रहे हैं। वैसे भी वनांचल क्षेत्र में कराए जाने वाले निर्माण कार्यों को लेकर कोई ज्यादा गंभीरता अधिकारियों के द्वारा भी नहीं बरती जाती। जहां जैसा पाए वैसा निर्माण कार्य करवा कर ठेकेदार निकल जाते हैं। शुरू-शुरू में चमचमाती सड़क नजर आती है लेकिन कुछ महीने बाद ऊपरी परतें उखड़ने के साथ-साथ किनारे भी टूटने लगते हैं। बमुश्किल साल भर भी सड़क टिक जाए तो बड़ी बात होती है। जरूरी है कि सड़क और पुल पुलिया का समय रहते जांच कर लिया जाए।

सोर्स – सत्यसंवाद डॉट