KORBA : शुरू होने से पहले टेंडर विवाद में फंसा कूलिंग टावर से ढेंगुरनाला तक स्वीकृत आरसीसी नाला निर्माण ,हाईकोर्ट पहुंचा मामला,ठेकेदार को अनुचित लाभ पहुंचाने ,कृत्यों की अनदेखी का आरोप …

कोरबा। जैन चौक बुधवारी से कोसाबाड़ी चौक तक बनने वाले गौरव पथ को लेकर जहां इसके निर्माण के औचित्य पर जनता के मन में सवाल उठे हैं और विरोध के बीच टेंडर को लेकर शिकायत हो गई है वहीं बालको क्षेत्र में कूलिंग टावर से ढेंगुरनाला तक आरसीसी नाला निर्माण का टेंडर भी विवाद में फंस गया है। एक ठेकेदार को लाभ देने के लिए उसके द्वारा टर्न ओव्हर के कैलकुलेशन में की गई लाखों की गंभीर वृद्धि को नजर अंदाज कर दिया गया।

गलत कैलकुलेशन के साथ ही एक फर्म के टेंडर में दूसरे फर्म के दस्तावेज लगा कर टेंडर हासिल करने के प्रयास को विफल करने की बजाय टेंडर खोल कार्य आदेश प्रदान कर दिया गया। यह मामला शिकायत के बाद अब हाईकोर्ट पहुंच चुका है, जिसके लिए कहीं न कहीं निगम के जिम्मेदार अधिकारियों की जानबूझकर अनदेखी बड़ा कारण है। इसे सांठगांठ का भी नाम दिया जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
नगर निगम कोरबा द्वारा बालको सेक्टर क्षेत्र में आरसीसी नाला निर्माण कार्य (NIT-187511) के लिए जारी निविदा अब तकनीकी परीक्षण और मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर गंभीर विवादों के घेरे में आ गई है। मिली जानकारी अनुसार निगम आयुक्त को लिखित शिकायत देकर आरोप लगाया है कि निविदा की शर्तों का खुला उल्लंघन करने वाले ठेकेदार को तकनीकी रूप से पात्र मानते हुए उसकी वित्तीय बोली खोल दी गई, जबकि कई ऐसे बिंदु थे जिन पर उसे प्रारंभिक स्तर पर ही अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए था।

👉 तीन प्रमुख बिंदुओं पर उठे सवाल

शिकायत में सबसे पहले ईपीएफ एवं ईएसआईसी चालान प्रस्तुत करने को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई है। तकनीकी निविदा में यह दस्तावेज अनिवार्य श्रेणी में शामिल था, इसलिए इसकी अनुपस्थिति स्वतः अपात्रता का आधार बनती है। दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण विवाद बिड कैपेसिटी (Bid Capacity) की गणना को लेकर है। निविदा दस्तावेजों के अनुसार कार्य पूर्णता वर्ष के आधार पर टर्नओवर पर एक निर्धारित गुणांक (Multiplying Factor) लगाया जाना था। शिकायतकर्ता का आरोप है कि संबंधित फर्म ने वर्ष 2021-22 के लिए 1.61 का गुणांक लगाया, जबकि नियमानुसार उसे 1.46 माना जाना चाहिए था क्योंकि कार्य पूर्णता का जो अनुभव प्रमाण पत्र लगाया गया है उसमे कार्य पूर्णता की तिथि 8 जुलाई 2021 है। यहीं से पूरी गणना प्रभावित हो गई। शिकायत के अनुसार 2,50,000,00/- न्यूनतम सिंगल वर्क कंप्लीशन क्राइटेरिया होना था। परंतु जिस ठेकेदार को टेंडर प्राप्त हुआ है उसने 1,64,86,044/- रुपये के अपने वर्क कंप्लीशन को 1.61 से गुणा कर 2,65,42,530/- रुपये दर्शाया, जबकि नियमानुसार गुणांक 1.46 से होने पर यह आंकड़ा 2,40,69,624/- मात्र बैठता और 24,72,906/- का फर्क आने से ठेकेदार टेंडर प्रक्रिया में भाग लेने योग्य ही नहीं रहता। इसके परिणामस्वरूप उपलब्ध आंकड़ा कृत्रिम रूप से बढ़ गया और संबंधित फर्म तकनीकी रूप से पात्र दिखाई देने लगा। आरोप है कि यह कोई मामूली गणितीय त्रुटि नहीं बल्कि पात्रता को प्रभावित करने वाली गंभीर गलती थी, जिसे जांच के दौरान पकड़ना निगम की जिम्मेदारी थी।

👉 दूसरे फर्म के दस्तावेज लगाने का आरोप

विवाद का तीसरा पहलू और भी गंभीर बताया जा रहा है। आरोप है कि संबंधित ठेकेदार ने जो बैंक साल्वेंसी सर्टिफिकेटअपलोड किया है वह सर्टिफिकेट उसी ठेकेदार के दूसरी फर्म का है। इसके बावजूद तकनीकी समिति ने दस्तावेजों को स्वीकार कर लिया और वित्तीय बोली खोल दी। यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो यह केवल प्रक्रियागत त्रुटि नहीं बल्कि निविदा प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सीधा प्रश्नचिन्ह है।

👉 नियमों का पालन या मनमानी?

टेंडर विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी मूल्यांकन का उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना होता है कि केवल वही फर्में वित्तीय प्रतिस्पर्धा में शामिल हों जो सभी अनिवार्य शर्तों का पालन करती हों। यदि अनिवार्य दस्तावेजों की कमी, गलत गणना या अपूर्ण प्रमाणीकरण के बावजूद किसी बोलीदाता को पात्र मान लिया जाता है तो पूरी निविदा प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। प्रश्न यह भी उठ रहा है कि जब दस्तावेजों में कथित विसंगतियां इतनी स्पष्ट थीं तो तकनीकी परीक्षण समिति ने उन्हें नजरअंदाज कैसे कर दिया? क्या यह महज लापरवाही थी या फिर किसी विशेष पक्ष को लाभ पहुंचाने की कोशिश?

👉 यह गंभीर मामला

सूत्रों के अनुसार शिकायत पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने के बाद माननीय उच्च न्यायालय तक पहुंच गया है। अब हाईकोर्ट में यह सवाल भी उठ सकता है कि तकनीकी समिति ने पात्रता संबंधी आपत्तियों की जांच किस आधार पर की और विवादित दस्तावेजों के बावजूद वित्तीय बोली खोलने का निर्णय क्यों लिया गया। यदि न्यायालय प्रथम दृष्टया शिकायत को सही मानता है तो न केवल निविदा प्रक्रिया पर रोक लग सकती है बल्कि मूल्यांकन से जुड़े अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हो सकती है।

👉 सबसे बड़ा सवाल

नगर निगम करोड़ों रुपये के विकास कार्यों में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा की बात करता है, लेकिन यदि निविदा शर्तों के उल्लंघन, गलत गणना और दस्तावेजी विसंगतियों के बावजूद बोली स्वीकार की जाती है तो आम जनता के मन में यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर नियम किसके लिए बनाए गए हैं?
बालको क्षेत्र का यह आरसीसी नाला निर्माण कार्य अभी शुरू भी नहीं हुआ है, लेकिन जिस तरह से इसकी निविदा प्रक्रिया विवादों और कानूनी चुनौती के घेरे में आ गई है, उसने निगम की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। अब सबकी निगाहें न्यायालय और निगम प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।