नई दिल्ली. कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 से भारतीय खेल प्रेमियों के लिए एक और बेहद शानदार और गौरवान्वित करने वाली खबर आई है. महिलाओं के 48 किलोग्राम भारवर्ग में अस्मिता डे की ऐतिहासिक स्वर्णिम सफलता के ठीक बाद, पुरुषों के 60 किलोग्राम भारवर्ग में हर्ष सिंह ने भी अपनी स्वर्णिम चमक बिखेरी है.
हर्ष ने एकतरफा और दबदबे वाले मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया के जोशुआ काट्ज को मात देकर भारत की झोली में दूसरा गोल्ड मेडल डाल दिया.
पुरुषों के 60 किग्रा वर्ग के फाइनल मुकाबले में हर्ष सिंह (Harsh Singh) शुरुआत से ही पूरी तरह हावी नजर आए. उन्होंने अपनी आक्रामक रणनीति, बेहतरीन संतुलन और सटीक दांव-पेच से ऑस्ट्रेलियाई प्रतिद्वंद्वी को कोई मौका नहीं दिया. हर्ष ने यह मुकाबला 10-0 के अंतर से अपने नाम किया. उनकी इस एकतरफा जीत ने मुकाबला देखने वाले हर खेल प्रेमी को रोमांचित कर दिया.
👉अस्मिता के बाद हर्ष: एक ही दिन में ‘डबल गोल्ड’


इससे पहले, अस्मिता डे ने महिलाओं के 48 किग्रा वर्ग में ‘गोल्डन स्कोर’ के जरिए 2-1से जीत दर्ज करके राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में भारत को जूड़ो का पहला स्वर्ण पदक दिलाया था. अस्मिता की इस ऐतिहासिक जीत के चंद पलों बाद ही हर्ष सिंह ने मैट पर अपना जलवा दिखाया और भारत के खाते में दूसरा स्वर्ण पदक जोड़ दिया. एक ही दिन में दो-दो स्वर्ण पदक हासिल कर भारतीय जूड़ोकाओं ने इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा लिया है.
👉खत्म हुआ दशकों लंबा इंतजार
राष्ट्रमंडल खेलों (CWG) के इतिहास में भारतीय जूडो का सफर हमेशा संघर्षपूर्ण और पदकों के करीब पहुंचकर चूकने वाला रहा था. इससे पहले भारत ने राष्ट्रमंडल खेलों की जूडो स्पर्धा में कुल 5 रजत (Silver) और 6 कांस्य (Bronze) पदक अपने नाम किए थे. भारत ने कई बार फाइनल तक का सफर तय किया, लेकिन कभी भी राष्ट्रमंडल खेलों की जूडो स्पर्धा में ‘गोल्ड’ का तमगा नहीं जीत पाया था. अस्मिता डे और हर्ष सिंह की इस जादुई जोड़ी ने भारत के इस दशकों लंबे इंतजार को बेहद शानदार अंदाज में खत्म कर दिया है.
👉भारतीय खेलों के लिए नया अध्याय
एक ही दिन में दो-दो गोल्ड मेडल जीतकर भारतीय जूडो टीम ने यह साबित कर दिया है कि वे विश्व स्तर पर किसी भी देश को चुनौती देने का माद्दा रखते हैं. यह स्वर्णिम सफलता न केवल भारत के खेल इतिहास में दर्ज होगी, बल्कि देश में कॉम्बैट स्पोर्ट्स (युद्ध कला से जुड़े खेल) को एक नई पहचान और गति प्रदान करेगी. अस्मिता और हर्ष का यह स्वर्णिम सफर आने वाली नई पीढ़ी के खिलाड़ियों के लिए एक नया इतिहास और प्रेरणास्रोत बनकर उभरा है.
