👉🏻 भाजपा प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी ने भी पदाधिकारियों की सक्रियता पर उठाए सवाल
रायपुर। छत्तीसगढ़ में भाजपा की सत्ता और संगठन के बीच तालमेल को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सरकार बनने के बाद भी पार्टी के पूर्व मंत्री-विधायकों की नाराजगी सामने आना इस बात का संकेत है कि संगठन और जनप्रतिनिधियों के बीच सब कुछ सहज नहीं चल रहा। 2 दिन के दौरे पर आईं छत्तीसगढ़ भाजपा प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी के सामने जब नेताओं ने अपनी उपेक्षा का दर्द बयां किया, तो बैठक में सत्ता-संगठन के रिश्तों की खटास खुलकर सामने आ गई।

एक छपी रिपोर्ट के मुताबिक, स्मृति ईरानी ने मंत्रियों से मुलाकात से पहले 74 पूर्व मंत्री-विधायकों के साथ बंद कमरे में बैठक की। इस दौरान नेताओं ने अपनी बात रखते हुए आरोप लगाया कि उनकी सिफारिशों पर सुनवाई नहीं हो रही। अधिकारियों पर जनप्रतिनिधियों की अनदेखी करने और मंत्रियों के नाम लेकर भी काम नहीं होने देने की शिकायतें की गईं। नेताओं का कहना था कि अधिकारी उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते और कई मामलों में मंत्री भी अधिकारियों के इशारों पर चलते नजर आते हैं।
बैठक में रिपोर्ट कार्ड का मुद्दा भी उठा। बताया गया कि स्मृति ईरानी ने रिपोर्ट कार्ड साथ लाते हुए नेताओं से कहा कि वे सक्रिय नहीं हैं और जमीन पर काम नजर नहीं आ रहा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार की योजनाओं को सोशल मीडिया पर साझा करने में भी नेता पीछे हैं। इस टिप्पणी ने संगठन की सक्रियता और सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने की भूमिका पर सवाल खड़े किए।
सम्मान और सुनवाई की मांग

पूर्व मंत्री-विधायकों ने अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए कहा कि यदि उन्हें सम्मान के साथ बुलाया जाएगा, तो वे जरूर जाएंगे। नेताओं ने आरोप लगाया कि पांच जिलों में कार्यक्रमों के दौरान अधिकारी ही मुख्य अतिथि बन जाते हैं, जबकि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को बैठकों तक के लिए नहीं पूछा जाता। उनका कहना था कि इस तरह उनकी भूमिका सामाजिक कार्यक्रमों तक सिमटती जा रही है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल यही है कि जब सत्ता में भाजपा की सरकार है, तब पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को अपनी ही सरकार में सुनवाई और सम्मान के लिए शिकायत क्यों करनी पड़ रही है? एक ओर प्रदेश प्रभारी नेताओं की सक्रियता पर सवाल उठा रही हैं, तो दूसरी ओर पूर्व मंत्री-विधायक अधिकारियों और मंत्रियों के रवैये पर नाराजगी जता रहे हैं।
यह स्थिति सत्ता और संगठन के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत को रेखांकित करती है। पार्टी के सामने चुनौती केवल सरकारी योजनाओं को जनता तक पहुंचाने की नहीं, बल्कि वरिष्ठ नेताओं की भूमिका तय करने, उनकी शिकायतों का समाधान करने और संगठनात्मक सक्रियता को जमीन पर मजबूत करने की भी है। बैठक में उठे मुद्दे अब इस बात की कसौटी होंगे कि शिकायतें बंद कमरे तक सीमित रहती हैं या उनके समाधान के लिए ठोस कदम भी उठाए जाते हैं।
