किसने हां बोलकर दिया गच्चा ,जानें इंडिया गठबंधन के कौन कौन से नेता नहीं पहुंचे रामलीला मैदान …

नई दिल्ली। दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर को INDIA गठबंधन ने ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ नारे के साथ शक्ति प्रदर्शन किया. इस शक्ति प्रदर्शन में इंडिया ब्लॉक के कई पुराने चेहरे और बड़े दिग्गज नजर नहीं आए.

हालांकि, उनके पार्टियों के दूसरे नेताओं की मौजूदगी रही. कांग्रेस की अगुवाई में आयोजित इस रैली में विपक्षी दलों के कई बड़े चेहरे एक साथ मंच पर नजर आए. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, सोनिया गांधी, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बिहार के नेता तेजस्वी यादव समेत कई विपक्षी नेता इस विरोध मार्च में शामिल हुए. लेकिन शिवसेना (यूबीटी) के उद्धव ठाकरे और एनसीपी के शरद पवार जैसे बड़े चेहरे गायब थे. बता दें कि इंडिया गठबंधन ने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए रविवार को ‘वोट बचाओ,देश बचाओ’ रैली का आयोजन रामलीला मैदान में किया.

रैली से पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर विपक्षी नेताओं का जमावड़ा लगा. यहां से कई नेता खुले वाहनों में सवार होकर मिंटो रोड पहुंचे और फिर वहां से रामलीला मैदान तक मार्च किया. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के साथ-साथ सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव, फारूक अब्दुल्ला, माकपा के महासचिव एमए बेबी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी राजा, भाकपा (माले) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य प्रमुख चेहरे रहे. वहीं कांग्रेस के तकरीबन सभी पू्र्व सीएम और बड़े नेताओं की उपस्थिति रही. ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी भी नजर आए.

👉ये बड़े नेता रैली से दूर रहे

इसमें आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल नहीं आए, लेकिन गोपाल राय कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी की बगल में बैठे नजर आए. इसी तरह शरद पवार बेशक नहीं आए, लेकिन उकी बेटी और सांसद सुप्रिया सुले नजर मंच पर नजर आईं. तमिलनाडु के पूर्व सीएम और डीएमके नेता एम.के. स्टालिन जरूर इस रैली में नजर नहीं आए. पहले वह इंडिया एलांयस के पार्ट थे. इसी तरह ओडिशा के पूर्व सीएम और बीजेडी के सुप्रीमो नवीन पटनायक भी नजर नहीं आए. हालांकि, वह इंडिया गठबंधन में कभी नहीं रहे. लेकिन बीते कुछ महीनों से बीजेडी नेताओं का बयान इंडिया एलायंस के समर्थन में आता रहा है. इसी तरह कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके, सौरभ दास औऱ आशुतोष रांका जैसे नेता भी रामलीला मैदान से दूर ही नजर आए.

👉SIR और कथित ‘वोट चोरी’ के खिलाफ विपक्ष का प्रदर्शन

इस रैली का मुख्य मुद्दा मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली है. विपक्षी दलों का आरोप है कि SIR के दौरान बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं. गठबंधन ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बताते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है.

👉21 दलों की मौजूदगी का दावा, विपक्षी एकजुटता का संदेश

रैली से पहले आई रिपोर्टों में INDIA गठबंधन के 21 दलों के नेताओं के मार्च में प्रतिनिधित्व की बात कही गई थी. कांग्रेस इस आयोजन के जरिए विपक्षी एकजुटता का संदेश देना चाहती है. खास बात यह रही कि कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राजद, वामपंथी दलों और नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख चेहरे भी एक साथ नजर आए. इस रैली का कार्यक्रम केवल रामलीला मैदान में सभा तक सीमित नहीं रहा. विपक्षी नेताओं ने पहले मल्लिकार्जुन खरगे के आवास से खुले वाहनों में मिंटो रोड तक का सफर किया. इसके बाद मिंटो रोड से अजमेरी गेट होते हुए रामलीला मैदान तक मार्च किया गया.

👉राहुल गांधी के लिए क्यों अहम है यह रैली?

रैली में नेताओं की मौजूदगी के साथ अलग-अलग राज्यों से पहुंचे पार्टी कार्यकर्ताओं ने भी हिस्सा लिया. रामलीला मैदान में समर्थकों ने SIR के विरोध और चुनाव आयोग के खिलाफ नारे लगाए. राहुल गांधी लगातार चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों का मुद्दा उठा रहे हैं. रामलीला मैदान की रैली के जरिए कांग्रेस इस मुद्दे को केवल अपनी पार्टी तक सीमित रखने के बजाय विपक्षी गठबंधन का साझा अभियान बनाने की कोशिश कर रही है. अखिलेश यादव और ममता बनर्जी जैसे नेताओं की मौजूदगी से यह संदेश देने की कोशिश हुई कि चुनाव आयोग और SIR को लेकर विपक्षी दलों के बीच साझा चिंता है. हालांकि अलग-अलग राज्यों में दलों की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं, ऐसे में इस एकजुटता को आगे किस तरह बनाए रखा जाता है, यह भी देखने वाली बात होगी.

कुल मिलाकर, रामलीला मैदान की रैली में राहुल गांधी के साथ सोनिया गांधी, खरगे, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव और वामपंथी दलों के नेताओं की मौजूदगी ने इसे विपक्ष का बड़ा साझा आयोजन बना दिया. अब इस प्रदर्शन का राजनीतिक असर इस बात से भी तय होगा कि विपक्ष अपने आरोपों और मांगों को आगे किस तरह संस्थागत और राजनीतिक स्तर पर उठाता है.