KORBA : जहां अपनों ने छोड़ा, वहां प्रशांति ने थामा हाथ… बुजुर्गों के लिए उम्मीद का घर बना प्रशांति वृद्धाश्रम

0 1 अक्टूबर, अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस विशेष

कोरबा। उम्र के उस पड़ाव पर, जब इंसान को सबसे ज्यादा जरूरत अपनों के साथ, स्नेह और सहारे की होती है, कुछ बुजुर्ग ऐसे भी हैं जिन्हें जिंदगी ने अपनों से दूर कर दिया। किसी के सिर से परिवार का साया उठ गया, तो किसी को अपने ही घर में उपेक्षा का सामना करना पड़ा। ऐसे बुजुर्गों के लिए कोरबा का प्रशांति वृद्धाश्रम पिछले 23 वर्षों से सिर्फ एक आश्रय नहीं, बल्कि एक ऐसे घर की भूमिका निभा रहा है, जहां उन्हें सम्मान, अपनापन और जीवन जीने का सहारा मिलता है। 1 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस के अवसर पर प्रशांति वृद्धाश्रम की कहानी उन बुजुर्गों की कहानी है, जिनके जीवन की सांझ को इस संस्था ने अकेलेपन के अंधेरे से निकालकर अपनत्व की रोशनी दी है।

👉23 साल पहले शुरू हुई थी एक संवेदनशील पहल

प्रशांति वृद्धाश्रम की नींव कोरबा के पहले कलेक्टर पीसी दलेई की पहल से पड़ी। नगर पालिक निगम, कोरबा द्वारा वृद्धाश्रम का निर्माण कराया गया। 19 सितंबर 1998 को तत्कालीन जांजगीर लोकसभा सांसद चरणदास महंत ने इसका लोकार्पण किया। हालांकि भवन तैयार होने के बाद भी वास्तविक रूप से वृद्धाश्रम के संचालन का सपना कुछ वर्षों बाद साकार हुआ। 23 अप्रैल 2003 को छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के मुख्य आतिथ्य में आयोजित समारोह के साथ प्रशांति वृद्धाश्रम के संचालन की शुरुआत हुई। इसके पीछे तत्कालीन कलेक्टर इशिता राय के प्रयास महत्वपूर्ण रहे। प्रशांति वृद्धाश्रम को छत्तीसगढ़ शासन के समाज कल्याण विभाग की योजना में शामिल किया गया और इसके संचालन की जिम्मेदारी रोटरी क्लब को सौंपी गई। करीब दो वर्ष संचालन के बाद रोटरी क्लब ने वृद्धाश्रम को जिला प्रशासन को हैंडओवर कर दिया।

👉नवदृष्टि के हाथों में जिम्मेदारी

समय के साथ प्रशांति वृद्धाश्रम की जिम्मेदारी भी बदलती रही। 1 जुलाई 2005 को तत्कालीन कलेक्टर गौरव द्विवेदी ने नवदृष्टि समाजसेवी संस्था को प्रशांति वृद्धाश्रम के संचालन की जिम्मेदारी सौंपी। तब से यानी 21 सालों से संस्था द्वारा वृद्धाश्रम का संचालन निरंतर किया जा रहा है। यहां रहने वाले बुजुर्गों के लिए संस्था ने इसे केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि परिवार जैसा माहौल देने का प्रयास किया है।

👉28 बुजुर्गों के लिए यही है अब उनका घर

वर्तमान में प्रशांति वृद्धाश्रम में 28 महिला एवं पुरुष वरिष्ठ नागरिक निवासरत हैं। यहां उन्हें भोजन, चिकित्सा और जरूरत की अन्य सुविधाएं निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती हैं। इन बुजुर्गों की जिंदगी को करीब से देखें तो हर चेहरे के पीछे एक अलग कहानी है। किसी ने अपना परिवार खोया है, किसी ने अपनों का साथ और किसी ने परिस्थितियों के सामने अपने घर की दहलीज छोड़ दी, लेकिन प्रशांति में पहुंचने के बाद इन बुजुर्गों को कम से कम इतना भरोसा जरूर मिलता है कि जीवन की इस सांझ में वे अकेले नहीं हैं।

👉बिना सरकारी-गैर सरकारी अनुदान के चल रहा आश्रम

प्रशांति वृद्धाश्रम की सबसे खास बात यह है कि नवदृष्टि समाजसेवी संस्था द्वारा इसके संचालन के लिए किसी भी प्रकार का सरकारी अथवा गैर सरकारी अनुदान प्राप्त नहीं किया जाता। संस्था अपने स्वयं के स्रोतों और समय-समय पर मिलने वाले जनसहयोग के माध्यम से वृद्धाश्रम का संचालन कर रही है। भोजन से लेकर चिकित्सा और रोजमर्रा की जरूरतों तक की व्यवस्था इसी सहयोग और संस्था के प्रयासों से पूरी की जाती है। यह व्यवस्था अपने आप में इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि किसी वृद्धाश्रम को वर्षों तक नियमित रूप से चलाना केवल आर्थिक संसाधनों का सवाल नहीं, बल्कि निरंतर सेवा, संवेदना और जिम्मेदारी की मांग करता है।

👉वृद्धजन दिवस का संदेश—उम्र नहीं, सम्मान जरूरी है

अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस केवल कैलेंडर में दर्ज एक तारीख नहीं है। यह समाज को यह याद दिलाने का अवसर है कि बुजुर्ग किसी जिम्मेदारी का बोझ नहीं, बल्कि परिवार और समाज की स्मृतियों, अनुभवों और संस्कारों की जीवित धरोहर हैं।प्रशांति वृद्धाश्रम की कहानी भी यही संदेश देती है—जब परिवार का साथ छूट जाए, तब समाज का हाथ नहीं छूटना चाहिए। 23 वर्षों की यात्रा में प्रशांति ने न जाने कितने बुजुर्गों को आश्रय दिया होगा। किसी के लिए यह चार दीवारें हैं, किसी के लिए भोजन और दवा का सहारा, लेकिन कई बुजुर्गों के लिए यह जगह शायद इससे कहीं ज्यादा है—एक ऐसा घर, जहां कोई उनका नाम लेकर उन्हें पुकारता है और जहां उनकी मौजूदगी मायने रखती है।