👉कहा – शिविर लगा देने से समस्याओं का समाधान नहीं होता, जमीन पर काम भी दिखना चाहिए
रायपुर । छत्तीसगढ़ में इन दिनों सरकार ‘सुशासन तिहार’ मना रही है। शहर से लेकर गांव तक शिविर लगाए जा रहे हैं, शिकायतें सुनी जा रही हैं और योजनाओं का लाभ पहुंचाने के दावे भी किए जा रहे हैं। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि सुशासन के इसी मंच से अब सत्ताधारी बीजेपी के नेता ही प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाने लगे हैं। यानी मंच सरकार का, माइक सरकार का… लेकिन निशाने पर सरकार के ही अफसर हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि जनता की समस्याओं के समाधान से ज्यादा चर्चा अब अफसरशाही की कार्यप्रणाली और जनप्रतिनिधियों की नाराजगी को लेकर होने लगी है।

गौरतलब है कि 1 मई से पूरे छत्तीसगढ़ में सुशासन तिहार चल रहा है। प्रदेश के मुखिया खुद अलग-अलग जिलों में पहुंचकर शासन की योजनाओं की जमीनी हकीकत जानने के साथ ही आम लोगों की समस्याएं सुन रहे हैं। ऐसे में जब मुख्यमंत्री खुद ग्राउंड जीरो पर उतरकर व्यवस्थाओं का जायजा ले रहे हैं, तो अफसर और जनप्रतिनिधि भी शिविरों में पहुंचकर हालात समझने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इसी “हकीकत जांच” के दौरान कई जगह प्रशासनिक अफसर जनप्रतिनिधियों के गुस्से का शिकार होते नजर आ रहे हैं। पिछले दिनों गरियाबंद और बलरामपुर जिले में आयोजित सुशासन तिहार अचानक “गुस्सा तिहार” में बदलता दिखाई दिया।
राजिम से बीजेपी विधायक रोहित साहू ने भ्रष्टाचार पर नाराजगी जताते हुए मंच से ही कह दिया कि भ्रष्ट पटवारी को “जूता मारूंगा”। यह बयान सुनते ही मंच पर बैठे अफसरों के चेहरे ऐसे उतर गए, मानो अगली बारी कहीं उनकी ही न हो। उधर अमलीपारा में आयोजित शिविर में पूर्व संसदीय सचिव गोवर्धन मांझी ने अफसरों की कार्यशैली पर तगड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा कि अधिकारी जनप्रतिनिधियों तक का फोन नहीं उठाते, तो आम जनता की सुनवाई कैसे होगी ? सवाल भी ऐसा कि मंच पर बैठे अफसर जवाब ढूंढते रह गए। मांझी ने तंज कसते हुए कहा कि सिर्फ शिविर लगा देने से समस्याओं का समाधान नहीं होता, जमीन पर काम भी दिखना चाहिए।
इसी कड़ी में बलरामपुर जिले की प्रतापपुर विधायक शकुंतला सिंह पोर्ते ने भी सुशासन तिहार के मंच से अफसरों को जमकर खरी-खोटी सुनाई। उन्होंने साफ कहा कि जनता परेशान होकर आती है और अगर उसका काम नहीं होता तो वह ‘श्राप’ देकर जाती है। विधायक ने अफसरों को याद दिलाया कि “पढ़-लिख लेने से कोई जनता से ऊपर नहीं हो जाता।” उनका यह बयान सुनकर मंच पर मौजूद अधिकारियों की “फाइलों वाली मुस्कान” कुछ देर के लिए गायब हो गई। राजनीतिक गलियारों में अब चर्चा यह है कि अगर सुशासन तिहार के मंच से ही बीजेपी नेताओं को अफसरशाही और भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलना पड़ रहा है, तो फिर विपक्ष को ज्यादा मेहनत करने की जरूरत ही क्या है ?
जनता भी सोच में है कि जब सत्ता पक्ष के नेता ही अधिकारियों से परेशान हैं, तो आम आदमी की फाइल किस भरोसे आगे बढ़ रही होगी। फिलहाल छत्तीसगढ़ में सुशासन तिहार के शिविर जारी हैं, शिकायतें भी सुनी जा रही हैं, लेकिन जनप्रतिनिधियों के इन तीखे बयानों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर प्रदेश में बेलगाम होती अफसरशाही पर लगाम कब लगेगी। जब सत्ता पक्ष के नेता ही मंच से अफसरों की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जता रहे हैं, तो साफ है कि “सुशासन” के दावों के बीच सिस्टम की हकीकत अभी भी सवालों के घेरे में है।
