मोबाइल यूजर्स सावधान ! दिमाग को खोखला कर रही मोबाइल की लत, डॉक्टरों ने बताया नींद और थकान का खौफनाक सच

एजेंसी । आज की जिंदगी में इंसान शायद ही कभी सच में शांत बैठ पाता है. पहले लंबा सफर खिड़की के बाहर देखते हुए कट जाता था, लाइन में इंतजार करते समय लोग आसपास की चीजों को महसूस करते थे और रात को सोने से पहले दिमाग खुद-ब-खुद धीमा पड़ जाता था.

लेकिन अब हर खाली पल किसी न किसी स्क्रीन से भर चुका है. कभी मोबाइल नोटिफिकेशन, कभी छोटी वीडियो, कभी पॉडकास्ट, तो कभी लगातार आने वाले मैसेज. ऐसे में दिमाग को असली आराम मिल ही नहीं पा रहा.

👉क्या इससे हमारे ऊपर असर पड़ रहा है?

न्यूरोलॉजिस्ट्स का कहना है कि लगातार मिलने वाला यह बैकग्राउंड स्टिमुलेशन इंसान के दिमाग के काम करने के तरीके को बदल रहा है. बाहर से देखने पर भले कोई इंसान आराम करता दिखाई दे, लेकिन दिमाग लगातार एक्टिव रहता है. यही वजह है कि आजकल लोग बिना ज्यादा शारीरिक मेहनत किए भी मानसिक रूप से थका हुआ महसूस करते हैं.

👉क्या हमारा ब्रेन हमेशा एक्टिव रहने के लिए बना है?

होसमैट हॉस्पिटल्स के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ प्रभु ने TOI को बताया कि, इंसानी दिमाग को कभी भी इस तरह लगातार एक्टिव रहने के लिए नहीं बनाया गया था. पहले दिनभर में छोटे-छोटे ऐसे पल मिल जाते थे, जब दिमाग खुद शांत हो जाता था. लेकिन अब हर खाली जगह डिजिटल चीजों से भर चुकी है. डॉ प्रभु कहते हैं कि स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, लगातार आने वाले नोटिफिकेशन और हर समय जुड़े रहने का दबाव इंसानी दिमाग को लगातार एक्टिव रखता है.

👉हमेशा एक्टिव कहने का क्या होता है असर?

एक्सपर्ट बताते हैं कि समस्या यह है कि यह थकान तुरंत महसूस नहीं होती. लोगों को लगता है कि मोबाइल स्क्रॉल करना या देर रात तक वीडियो देखना आराम देने वाला काम है, लेकिन असल में दिमाग लगातार नई जानकारी को प्रोसेस करता रहता है. यही कारण है कि नर्वस सिस्टम हमेशा हल्की सतर्क अवस्था में बना रहता है. धीरे-धीरे यह आदत मानसिक थकान, ध्यान की कमी और इमोशनल बर्नआउट में बदल सकती है. नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ की रिसर्च में भी सामने आया है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन देखने और देर रात तक डिजिटल चीजों में लगे रहने से नींद की क्वालिटी, इमोशनल संतुलन और ध्यान लगाने की क्षमता पर असर पड़ता है. खासतौर पर देर रात की लगातार स्क्रॉलिंग दिमाग को अलर्ट मोड में बनाए रखती है.

👉क्यों हमारे लिए सही नींद जरूरी है?

अरेटे हॉस्पिटल्स के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ सुरेश बाबू पी बताते हैं कि दिमाग के अंदर एक खास सफाई सिस्टम होता है, जिसे ग्लिम्फैटिक सिस्टम कहा जाता है. यह सिस्टम गहरी नींद के दौरान सबसे ज्यादा सक्रिय होता है और दिनभर जमा होने वाले जहरीले मेटाबॉलिक पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता है. डॉ सुरेश बाबू पी के अनुसार, अगर लगातार नींद की कमी रहे या रात में ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल की जाए, तो लंबे समय में दिमाग की काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. उन्होंने कम से कम 6 से 8 घंटे की बिना रुकावट नींद लेने और रात में स्क्रीन टाइम घटाने की सलाह दी है.

👉 यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.