रूस और वेनेजुएला के जरिए पक्की की जाएगी देश की ऊर्जा सुरक्षा,होर्मुज में तनाव के बीच भारत का जानें प्लान B …

नई दिल्ली। होर्मुज संकट के बाद से भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रणनीति और तेज कर दी है। खाड़ी देशों से ईंधन आपूर्ति बाधित होने के जोखिम को देखते हुए भारत ने एक तरफ रूस के आर्कटिक इलाके से LNG मंगाने और और दूसरी तरफ वेजेनुएला के दो बड़े ब्लारों को परिचालन अपने हाथ में लेने की तैयारी कर रहा है।

रूस के उप विदेश मंत्री आंद्रेई रुडेंको ने हाल ही में बताया कि भारत आर्कटिक क्षेत्र में तेल-गैस विकास और नॉर्दन सी रूट में सहयोग बढ़ाने में गहरी रुचि दिखा रहा है।

एक तरफ भारत और रूस के बीच 2029 कर सहयोग कार्यक्रम तय है। दूसरी ओर, वेनेजुएला के नए कानून के तहत ONGC सैन क्रिस्टाबल और कारोबोबो- 1 तेल ब्लॉकों के परिचालन नियंत्रण का समझौता करने जा रही है। अब तक वेनेजुएला ने भारत को सीमित और सिर्फ पुराना फंसा लाभांश वसूलने के लिए ही कच्चा तेल मिल रहा था।

नए प्रावधनों से ओएनजीसी को अमेरिका पाबंदियों के कानूनी जोखिम के बिना सीधे कुओं के संचालन और नियमित तेल उत्पादन की पूरी छूट मिल गई है।

👉आर्कटिक डील के फायदे

  • स्वेज मार्ग के मुकाबले चेन्नई-व्लादिवोस्तक रूट 5,600 किलोमीटर छोटा है। इस यात्रा में 16 दिन कम लगेंगे और 35% ईंधन बचेगा।
  • स्वेज नहर से न गुजरने रे कारण 4.2 करोड़ रुपए तक का टोल बचेगा।
  • युद्ध क्षेत्र से बाहर होने के कारण अतिरिक्त बीमा भी नहीं देना पड़ेगा।
  • आर्कटिक के 20 नए बंदरगाहों के प्रबंधन का मौका मिलेगा।

👉वेनेजुएला से डील के लाभ

  • यह रास्ता होर्मुज जैसे युद्ध प्रभावित संकरे समु्द्री मार्गों से 100 प्रतिशत सुरक्षित है।
  • बाजार महंगा तेल खरीदने के बजाय कुओं से सीधे तेल निकालने पर 5 से 10 डॉलर प्रति बैरल की बचत होगी।

👉आर्थिक मजबूती और ऊर्जा सुरक्षा महत्वपूर्ण

भारत द्वारा रूस से रिकॉर्ड मात्रा में तेल आयात करना केवल अनुकूल बाजार परिस्थितियों को ही नहीं दर्शाता है। यह एक व्यापक रणनीतिक दृष्टिकोण का संकेत है जिसमें आर्थिक मजबूती और ऊर्जा सुरक्षा बाहरी राजनीतिक दबाबों से अधिक महत्वपूर्ण है।
वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बनी रहने और भू-राजनीतिक तवानों के कारण व्यापार प्रवाह में लगातार बदलाव आने के कारण, निकट भविष्य में रूस भारत की कच्चे तेल आयात रणनीति का आधारशिला बना रहेगा।