CG : वेंटिलेटर पर हेल्थ सिस्टम ! पोस्टमार्टम के 3 घण्टे बाद भी नहीं मिला वाहन , कमार परिवार को कंधे पर ढोना पड़ा शव …

गरियाबंद । छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के मैनपुर क्षेत्र से स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े करने वाली तस्वीर सामने आई है। यहां एक बुजुर्ग कमार जनजाति के व्यक्ति की मौत के बाद पोस्टमार्टम तो हो गया, लेकिन परिजनों को शव गांव तक ले जाने के लिए शव वाहन नहीं मिल सका। करीब तीन घंटे तक इंतजार करने के बाद परिजनों को बांस की बल्ली का सहारा लेना पड़ा। और परिजन शव को कंधे पर लेकर पैदल घर पहुंचे। इस घटना ने एक बार फिर सरकार के दावों और ग्रामीण-आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं और आपात परिस्थितियों में उपलब्ध व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जानकारी के मुताबिक मामला मैनपुर थाना क्षेत्र के ग्राम बरदुला का है। मृतक की पहचान सुमेर सिंह के रूप में बताई जा रही है। परिजनों के अनुसार वह पिछले करीब पांच दिनों से लापता था। गुरुवार सुबह जंगल में उसका शव मिला। ग्रामीणों की सूचना के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और आवश्यक कार्रवाई करते हुए शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद परिजनों को उम्मीद थी कि शव को गांव तक ले जाने के लिए वाहन की व्यवस्था की जाएगी। परिजनों के मुताबिक पोस्टमार्टम के बाद वे शव वाहन का इंतजार करते रहे। करीब तीन घंटे बीत गए, लेकिन उन्हें शव घर तक ले जाने के लिए वाहन उपलब्ध नहीं हो सका।

लंबे इंतजार के बाद परिवार के सामने शव को घर ले जाने की समस्या खड़ी हो गई। आखिरकार परिजनों ने बांस की बल्ली की मदद से शव को बांधा और उसे कंधे पर लेकर पैदल ही गांव की ओर निकल पड़े। यह दृश्य कई सवाल खड़े करता है। अंतिम यात्रा के समय जब एक परिवार को प्रशासन और स्वास्थ्य व्यवस्था से मदद की उम्मीद होती है, उस समय उन्हें शव कंधे पर लेकर जाने की नौबत क्यों आई?

👉कमार जनजाति के परिवार के साथ ऐसी स्थिति क्यों ?

आपको बता दे कमार छत्तीसगढ़ की विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों में शामिल समुदाय है। ऐसे दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं और परिवहन की उपलब्धता पहले से ही महत्वपूर्ण मुद्दा रही है। सरकार ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने और जरूरतमंद परिवारों को सहायता उपलब्ध कराने के दावे करती है। ऐसे में किसी मृतक के शव को पोस्टमार्टम के बाद घर तक पहुंचाने के लिए भी परिवार को तीन घंटे इंतजार करना पड़े और अंत में बांस-बल्ली का सहारा लेना पड़े, तो जमीनी स्तर पर व्यवस्थाओं की उपलब्धता और उनके संचालन को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल शव वाहन की उपलब्धता को लेकर है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही कि…..क्या स्टमार्टम के बाद शव को गांव तक पहुंचाने के लिए वाहन की व्यवस्था की जानी थी ? यदि वाहन उपलब्ध नहीं था, तो परिजनों को पहले ही इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई ? क्या अस्पताल या संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों ने वाहन उपलब्ध कराने का प्रयास किया ? तीन घंटे तक इंतजार के बावजूद वाहन नहीं मिलने पर वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई ? क्या संबंधित अधिकारियों को इस स्थिति की जानकारी थी ? ये वो सवाल है, जिनके जवाब स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की ओर से सामने आना जरूरी है।

👉क्या जिम्मेदारों पर होगी कार्रवाई ?

मामला सामने आने के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस पूरे घटनाक्रम की जांच कराते हैं या नहीं ? यदि शव वाहन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी संबंधित विभाग की थी और व्यवस्था में चूक हुई है, तो जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी होगा। किसी परिवार के लिए अपने परिजन की मौत के बाद अंतिम संस्कार तक का समय बेहद संवेदनशील होता है। ऐसे समय में प्रशासनिक और स्वास्थ्य व्यवस्था से मानवीय सहयोग की अपेक्षा रहती है।

तीन घंटे तक शव वाहन का इंतजार और फिर बांस-बल्ली के सहारे शव को घर ले जाने की तस्वीर केवल एक परिवार की मजबूरी नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े करती है। फिलहाल इस मामले में स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है। विभाग की प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि शव वाहन उपलब्ध क्यों नहीं हो पाया और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी थी।