CG : GPM में हो गया बड़ा खेला ! बड़े झाड़ के मद की शासकीय जमीन पर कूटरचना कर बना दिया फर्जी पट्टा ,तन गई बाड़ी ,मकान , दुकान ! मिशल में कूटरचना, फर्जी नामांतरण और करोड़ों के लोन शिकायत मामले में राजस्व विभाग ने नहीं लिया संज्ञान, संरक्षण,संलिप्तता का गंभीर आरोप ! जानें पूरा मामला ….

0 एक ही भूमि के बने दो-दो मिशल, मध्यप्रदेश शासन का नाम सफेदा से मिटाकर निजी भू-स्वामी बना दिया—जंगल मद जमीन घोटाले में बेबी लता और शंकर प्रजापति पर गंभीर आरोप,शासकीय जमीन को कागजों में किया गायब!

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही।तहसील सकोला के ग्राम सेखवा में खसरा नंबर 1408 की “बड़े झाड़ जंगल मद” की शासकीय भूमि को लेकर सामने आया मामला अब बड़े घोटाले का रूप ले चुका है। यह भूमि, जो वर्षों तक मध्यप्रदेश शासन के नाम दर्ज रही, उसे कथित रूप से रिकॉर्ड से मिटाकर निजी स्वामित्व में बदल दिया गया। इस पूरे मामले में बेबी लता और उनके पति शंकर प्रजापति का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है।

👉एक ही जमीन के दो-दो मिशल—सबसे बड़ा खुलासा

इस घोटाले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि एक ही खसरा नंबर 1408 की जमीन के दो से तीन अलग-अलग मिशल तैयार कर दिए गए।
जहां एक ओर पुराने अभिलेखों में यह भूमि शासकीय “जंगल मद” के रूप में दर्ज है, वहीं दूसरी ओर संशोधित मिशल में निजी व्यक्तियों के नाम चढ़ा दिए गए।
यह स्थिति न केवल गंभीर अनियमितता है, बल्कि यह साबित करती है कि जमीन की मूल पहचान के साथ संगठित तरीके से छेड़छाड़ की गई है।

👉सफेदा से मिटाया गया “मध्यप्रदेश शासन”

शिकायत पत्र और दस्तावेजों के अनुसार, मिशल में “मध्यप्रदेश शासन” का नाम सफेद स्याही (सफेदा) से मिटाकर उसकी जगह निजी नाम दर्ज किए गए।
यह कोई सामान्य त्रुटि नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से कूट रचना और दस्तावेजों में फर्जीवाड़े का मामला है।

इसी प्रक्रिया के तहत खसरा 1408/1 (25.54 एकड़) को संशोधित कर उसके हिस्से 1408/1/2 (16.36 एकड़) में ईश्वरदीन और ददुवा के नाम जोड़ दिए गए।

👉पुराने रिकॉर्ड खोल रहे फर्जीवाड़े की परतें

वर्ष 1989-90, 1994-95 और 1999-2000 के राजस्व अभिलेखों में यह भूमि लगातार शासन के नाम दर्ज पाई गई है।
इतना ही नहीं, वर्ष 1954-55 के अधिकार अभिलेख खाता क्रमांक 344 में लाल स्याही से छेड़छाड़ किया गया है
भी इस जमीन को “बड़े झाड़ जंगल मद” के रूप में शासकीय बताते हैं।

यानी, दशकों तक सरकारी रही जमीन को अचानक निजी बना देना कई बड़े सवाल खड़े करता है।

👉मौके पर जंगल, कागजों में मालिक

मामले की एक और अहम बात यह है कि जमीन पर आज भी साल के पेड़ मौजूद हैं और वन विभाग द्वारा नीलगिरी का रोपण किया गया है।
इसके बावजूद कागजों में इसे निजी भूमि दिखाकर स्वामित्व का दावा किया जा रहा है।

👉 शिकायत के बाद भी कार्रवाई शून्य

29 दिसंबर 2023 को इस मामले की शिकायत कलेक्टर कार्यालय में की गई थी। 2024 में मामला प्रशासनिक समीक्षा में भी गया, लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
आरोप यह भी है कि मामले से जुड़ी फाइल तक गायब कर दी गई, जिससे संदेह और गहरा गया है।

👉कार्रवाई क्यों नहीं? सामने आया “सिस्टम कनेक्शन”

सबसे गंभीर आरोप यह है कि इस पूरे मामले में कई राजस्व अधिकारी शामिल हैं।
यदि निष्पक्ष जांच होती है, तो कई अधिकारियों की भूमिका उजागर होगी।
इसी वजह से, स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि मोटी रकम के लेनदेन के जरिए पूरे मामले को रफा-दफा कर दिया गया और कार्रवाई को जानबूझकर रोका गया।

👉शिकायत में एक-एक बिंदु, फिर भी कार्रवाई नहीं

इस पूरे मामले में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि शिकायतकर्ता ने हर तथ्य और अनियमितता को एक-एक बिंदु में विस्तार से लिखकर प्रशासन के सामने रखा। जमीन के मूल रिकॉर्ड, पुराने अभिलेख, और वर्तमान विसंगतियों को दस्तावेजों के साथ प्रस्तुत किया गया। यहां तक कि शिकायतकर्ता ने उसी भूमि के दो अलग-अलग मिशल भी प्रमाण के तौर पर शिकायत के साथ संलग्न किए, जिससे स्पष्ट रूप से छेड़छाड़ साबित होती है।
इसके बावजूद, इतने ठोस साक्ष्यों के बाद भी लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं होना अपने आप में एक “मील का पत्थर” बन गया है—जो यह दर्शाता है कि मामला केवल लापरवाही का नहीं, बल्कि कहीं न कहीं सिस्टम के भीतर गहरी मिलीभगत का संकेत देता है।

👉विवादित जमीन पर करोड़ों का लोन

मामला तब और ज्यादा गंभीर हो गया जब यह सामने आया कि वर्ष 2025 में इसी विवादित जमीन को गिरवी रखकर करोड़ों रुपये का लोन लिया गया।
यह लोन बेमेतरा स्थित IDFC बैंक की शाखा लिया गया, जिसने पूरे घटनाक्रम को और संदिग्ध बना दिया है।

👉अफसर कनेक्शन से बढ़ी सियासी हलचल

स्थानीय स्तर पर एक “टॉप महिला अफसर” के कनेक्शन की चर्चा ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है।
हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस एंगल ने प्रशासनिक तंत्र पर दबाव बढ़ा दिया है।

👉सिस्टम पर खड़े बड़े सवाल

यह मामला अब सीधे-सीधे प्रशासनिक सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर रहा है—
सरकारी जमीन निजी कैसे हुई?
मिशल में बदलाव किसके आदेश से हुआ?
शिकायत के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या पूरा सिस्टम इस खेल में शामिल है?

👉उच्चस्तरीय जांच की मांग

शिकायत में खसरा नंबर 1408 और उससे जुड़े सभी अभिलेखों की उच्चस्तरीय जांच की मांग की गई है।
साथ ही, फर्जी प्रविष्टियों को निरस्त कर जमीन को पुनः शासन और वन विभाग के नाम दर्ज करने की बात कही गई है।
दोषी अधिकारियों और संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ IPC और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की मांग भी तेज हो गई है।

👉एक जमीन नहीं, पूरे सिस्टम का मामला

ग्राम सेखवा का यह मामला अब सिर्फ एक जमीन विवाद नहीं रहा।
यह एक ऐसा केस बन चुका है, जिसमें अगर निष्पक्ष जांच होती है तो राजस्व विभाग के कई चेहरे बेनकाब हो सकते हैं।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में सच्चाई सामने लाता है या फिर यह फाइल भी सिस्टम की परतों में हमेशा के लिए दबा दी जाएगी।