बिलासपुर। जिले के बिल्हा विकासखंड अंतर्गत ग्राम गुमा स्थित सेवा सहकारी समिति क्रमांक 63 में 3 लाख 38 हजार रुपए के कथित गबन के मामले में पुलिस ने अपराध दर्ज कर विवेचना प्रारम्भ की है।
बिल्हा थाने में 26 सितंबर 2026 को दर्ज FIR के अनुसार समिति के तीन चेकों में स्वीकृत राशि से अधिक रकम दर्ज कर भुगतान किए जाने का आरोप है। मामले में संस्था प्रबंधक शरद कुमार कश्यप, सुपरवाइजर हितेश सलूजा और जिला सहकारी बैंक शाखा बिल्हा के शाखा प्रबंधक लक्ष्मण कौशिक को आरोपी बनाया गया है।
👉दस्तावेजों के अनुसार समिति के प्रस्ताव में कुल 3 लाख 14 हजार 50 रुपए की राशि स्वीकृत थी। इसके लिए जुलाई, सितंबर और अक्टूबर 2025 में तीन चेक जारी किए गए। आरोप है कि चेकों में कांट-छांट कर कुल राशि 6 लाख 52 हजार 50 रुपए कर दी गई। इस तरह स्वीकृत राशि से 3 लाख 38 हजार रुपए अधिक निकाले जाने का आरोप है।
मामले में सबसे बड़ा सवाल चेकों में हुई कथित ओवरराइटिंग को लेकर है। यदि चेक की राशि में बदलाव हुआ था तो बैंक स्तर पर उसका सत्यापन कैसे हुआ और भुगतान से पहले समिति के प्रस्ताव से उसका मिलान क्यों नहीं किया गया? इसकी जांच अब पुलिस के लिए महत्वपूर्ण होगी।
👉14 महीने बाद सामने आया मामला?

पहला चेक जुलाई 2025 का है, जबकि FIR सितंबर 2026 में दर्ज हुई। इस दौरान समिति में नियमित गतिविधियां चलती रहीं। नवंबर 2025 से जनवरी 2026 तक धान खरीदी भी हुई। FIR में प्राधिकृत अधिकारी के नियमित रूप से समिति में आने-जाने और दस्तावेजों के अवलोकन का उल्लेख है।ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि समिति के दस्तावेजों और बैंक लेनदेन की निगरानी होती थी, तो कथित अनियमितता पहले क्यों सामने नहीं आई? मार्च-अप्रैल 2026 में अंकेक्षण होने के बाद भी सितंबर में FIR दर्ज होने की परिस्थितियां भी जांच के दायरे में हैं।
👉मृत प्रबंधक को आरोपी बनाया गया
मामले में संस्था प्रबंधक शरद कुमार कश्यप को आरोपी बनाया गया है। वहीं उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनकी मृत्यु FIR दर्ज होने से पहले हो चुकी थी। यदि यह तथ्य मृत्यु प्रमाणपत्र से पुष्ट होता है, तो FIR में मृत व्यक्ति को आरोपी बनाए जाने की परिस्थितियों की भी जांच आवश्यक होगी।
👉बैंक की भूमिका जांच के घेरे में
तीनों चेकों में कथित राशि परिवर्तन के बावजूद भुगतान होने की बात सामने आने के बाद जिला सहकारी बैंक शाखा बिल्हा की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। मूल चेक, बैंक रिकॉर्ड, भुगतान प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों के सत्यापन की जांच से ही स्पष्ट होगा कि कथित अतिरिक्त राशि का भुगतान किस प्रक्रिया के तहत हुआ।
अब पुलिस के सामने कार्यवाही पंजी, तीनों मूल चेक, संबंधित बैंक खाते का पूरा लेनदेन, समिति के प्रस्ताव, अंकेक्षण रिपोर्ट और धान खरीदी अवधि के रिकॉर्ड की जांच महत्वपूर्ण होगी।
गुमा समिति का मामला अब सिर्फ 3.38 लाख रुपए की कथित गड़बड़ी तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि कथित हेरफेर हुआ तो वह किस स्तर पर हुआ और करीब 14 महीने तक इसकी जानकारी जिम्मेदारों को क्यों नहीं हुई। इन सवालों का जवाब जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
